Home | Poison Free Agriculture Farming | हानिकारक बनाम लाभदायक खेती - खाद्य सूरक्षा, Food Security

Sections

Newsletter
Email:
Poll: Like Our New Look?
Do you like our new look & feel?

हानिकारक बनाम लाभदायक खेती - खाद्य सूरक्षा, Food Security

Font size: Decrease font Enlarge font

खाद्य सुरक्षा से तात्पर्य खाद्य पदार्थों की सुनिश्चित आपूर्ति एवं जनसामान्य के लिये भोज्य पदार्थों की उपलब्धता से है। पूरे इतिहास में खाद्य सुरक्षा सदा से एक चिन्ता का विषय रहा है। सन 1974 में विश्व खाद्य सम्मेलन में 'खाद्य सुरक्षा' की परिभाषा दी गयी जिसमें खाद्य आपूर्ति पर बल दिया गया (United Nations 1975)। 1983 में, खाद्य एवं कृषि संगठन ने अपनी अवधारणा का विस्तार किया कमजोर वर्गों को खाद्य सुरक्षा व आपूर्ति उपलब्द्ध करवाने की सुनिश्चितता पर बल दिया (FAO 1983)। जिसका अर्थ है “हर समय सभी लोगों को आवश्यक बुनियादी आहार की उपलब्द्धता सुनिश्चित होनी चाहिए जो उनके शारीरिक और आर्थिक दोनों तरह से पहुंच में होता है।" अर्थात खाद्य सुरक्षा का अर्थ है समाज के सभी नागरिकों के लिए जीवनकाल में पूरे समय पर्याप्त मात्रा में ऐसे विविधतापूर्ण भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना, जो भोजन सांस्कृतिक तौर पर सभी को मान्य हो और उन्हें हासिल करने के समुचित माध्यम गरिमामय हों।

1986 में, अत्यधिक प्रभावशाली विश्व बैंक की रिपोर्ट "गरीबी और भूख" खाद्य असुरक्षा की लौकिक गतिशीलता पर केंद्रित थी (Reutlinger 1986)। इसमें निरंतर या संरचनात्मक गरीबी और कम आय की समस्याओं से सम्बंधित ‘चिरकालिक खाद्य असुरक्षा’ एवं प्राकृतिक आपदाओं, आर्थिक पतन या संघर्ष की वजह से ‘अस्थायी खाद्य असुरक्षा’ के बीच व्यापक रूप से अन्तर स्वीकार करने की शुरूआत की घोषणा की थी। खाद्य सुरक्षा की इस अवधारणा को इस प्रकार बताया गया है: "एक सक्रिय एवं स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त भोजन हर समय सभी लोगों की पहुंच में होना चाहिए"।

भारतवर्ष में बढ़ती हुई आबादी को भरपेट भोजन उपलब्द्ध करवाने में व आत्मनिर्भर बनाने के लिए के लिए यहाँ के वैज्ञानिकों, नीति-निर्धारकों व किसानों ने सराहनीय कार्य किया है (धर्मबीर यादव एवं जयनारायण भाटिया 2003)। लेकिन किसान को उसकी उपज का लागत मूल्य भी न मिलना व रासायनयुक्त उत्पाद आज एक चिन्ता का विषय भी है।

रासायानिक खेती: रासायानिक खेती खाद्यान आपूर्ति को पूरा करने के लिए एक समय पर आवश्यक थी लेकिन इससे भूमि और जल संसाधनों के दोहन, उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में कई गुना वृद्धि हुई है। स्थानांतरण खेती (Shifting cultivation) भी भूमि क्षरण का एक महत्वपूर्ण कारण रहा है। पर्यावरण पर कृषि विकास के प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि गतिविधियों से पैदा होता है जो भूमि क्षरण, भूमि लवणता में योगदान करते हैं तथा आवश्यक पोषक तत्वों का ह्रास करते हैं।

हालांकि पिछले 60 वर्षों के दौरान अनाज का उत्पादन 4.5 गुना अधिक हो गया है (Lal 2004) लेकिन सन 2050 तक हमारे देश को कम होते भूमि संसाधनों के साथ बढ़ती हुई आबादी की खाद्यान आपूर्ति के लिए 300 मिलियन टन अनाज की आवश्यकता होगी (Pandey and Singh 2012) जिसको इस पद्धति से पूरा कर पाना सम्भव दिखायी नहीं देता है।

जैविक खेती: जैविक खेती में परम्परागत रासायानिक खेती की तुलना में लगभग 8 से 20 प्रतिशत उत्पादन कम होता है (Mäder et al. 2002, Ponisio et al. 2015, Reganold and Wachter 2016)। इसलिए कहा जा सकता है कि जैविक खेती से भी हम बढ़ती हुई आबादी को भोजन देने में सक्षम नहीं हो सकते हैं।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती: जीरो बजट प्राकृतिक खेती में पूरा उत्पादन, रासायनमुक्त व लागत मूल्य लगभग न के बराबर होता है। इसलिए यह खाद्य सुरक्षा में सहयोगी है।

भरपेट खाना-पीना सभी को सताये।

सभी जहर-मुक्त खाने-पीने की याद सताये।।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती जो अपनाये।

भरपेट व जहर-मुक्त खाने-पीने की याद किसे आये।।

साभार: डा. जगवीर रावत, (सह-प्राध्यापक - पशु चिकित्सा माइक्रोबायोलॉजी विभाग, लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार - 125004, हरियाणा, भारत) के मार्गदर्शन के लिए लेखक आभारी हैं।

डा. जे.एन. भाटिया, प्रधान कृषि वैज्ञानिक, चौ.च.सिं. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार का लेखन शोधन एवं संशोधन के लिए लेखक आभारी हैं।

References

FAO, 1983, “World Food Security: a Reappraisal of the Concepts and Approaches,” Director General’s Report. Rome.

Lal R., 2004, “Soil carbon sequestration in India,” Climatic Change; 65(3): 277-296. [Web Reference]

Mäder P., et al., 2002, “Soil fertility and biodiversity in organic farming,” Science; 296(5573): 1694-1697. [Web Reference]

Pandey J. and Singh A., 2012, “Opportunities and constraints in organic farming: an Indian perspective,” Journal of Scientific Research; 56: 47-72. [Web Reference]

Ponisio L.C., et al., 2014, “Diversification practices reduce organic to conventional yield gap,” Proceedings of the Royal Society B; 282(1799). [Web Reference]

Reganold J.P. and Wachter J.M., 2016, “Organic agriculture in the twenty-first century,” Nature Plants; 2: 1-18. [Web Reference]

Sharma K., Mehta S. and Sinha A.K., 2012, “Global Warming, Human Factors and Environment: Anthropological Perspectives,” Punjab University, Chandigarh; EXCEL INDIA PUBLISHERS, New Delhi. [Web Reference]

United Nations, 1975, “Report of the World Food Conference, Rome 5-16 November 1974,” New York. [Web Reference]

Reutlinger S., 1986, “Poverty and Hunger: Issues and Options for Food Security in Developing Countries. A World Bank Policy Study,” The World Bank, 1818 H Street, NW, Washington, DC 20433. [Web Reference]

धर्मबीर यादव एवं जयनारायण भाटिया, 2003, “टिकाऊ कृषि हेतु वर्मी-कल्चर,” कृषि विज्ञान केन्द्र, कैथल; विस्तार शिक्षा निदेशालय, चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार - हरियाणा।

Rate this article
5.00