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हानिकारक बनाम लाभदायक खेती - टिकाऊ कृषि पद्धती, Sustainable Agriculture

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एक प्रणाली अथवा पद्धति का लगातार बने रहने की क्षमता को टिकाऊपन के रूप में परिभाषित किया गया है (Edwards-Jones and Howells 2001)। अमेरिकी नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज की रिपोर्ट के अनुसार, कोई भी कृषि योग्य भूमि, चाहे वह रासायानिक हो या जैविक, टिकाऊ कृषि पद्धती कही जा सकती है यदि (1) यह उच्च गुणवत्ता वाले भोजन का पर्याप्त मात्रा में उत्पादन करने में सक्षम हो, (2) प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग एवं पर्यावरण को बढ़ाती हो, (3) वित्तीय रूप से व्यवहारिक हो, और (4) किसान एवं समाज के लिए हितकारी होने में योगदान देती हो (धर्मबीर यादव एवं जयनारायण भाटिया 2003, National Research Council, 2010)।

अपने ही खेत-खलिहान या घर पर उत्पादित ऊर्जा के नवीनीकरण योग्य संसाधनों पर निर्भरता के बिना किसान कभी भी टिकाऊ खेती करने में न तो आज तक सफल हुआ (धर्मबीर यादव एवं जयनारायण भाटिया 2003) और न ही इसके बिना कोई उम्मीद की किरण दिखायी देती है। टिकाऊ खेती में समन्वित पोषक तत्व, कीटरोधक, रोगरोधक व खरपतवार उपयोगी ज्ञान के आधार पर ही कृषि उत्पादकता को उच्च स्तर पर बनाए रखा जा सकता है और धरोहर रूपी प्राकृतिक संसाधनों को भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

खाद्यान के विषय में हमारे देश ने आत्मनिर्भरता तो हासिल की है लेकिन यह बढ़ौतरी प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण के रूप में सामने आयी है। सघन फसल चक्र जैसे धान-गेहूँ, रासायानिक उर्वरकों के अत्याधिक उपयोग के परिणामस्वरूप हमारी  भूमि में कार्बनिक अंश व उर्वरा शक्ति में कमी आयी है जिस कारण भूमि की भौतिक सरंचना व रासायानिक गुणों पर विपरीत असर हुआ है (धर्मबीर यादव एवं जयनारायण भाटिया 2003)। अत: इन सभी विपरीत परिस्थितियों को मध्य नजर रखते हुए टिकाऊ कृषि पद्धति अपनाने की व्यापक आवश्यकता है।

रासायानिक खेती: इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे वैज्ञानिकों ने भारत की बढ़ती हुई आबादी की खाद्यान आपूर्ति के लिए अतुलनीय योगदान दिया है लेकिन रासायानिक खेती में रासायनों के बढ़ते उपयोग के कारण उच्च गुणवत्ता का भोजन नहीं कहा जा सकता है। यह पद्धती प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा नहीं देती है साथ ही अत्याधिक रासायनों के उपयोग से वातावरण को भी हानि पहुंचाती है। वित्तीय रूप से व्यवहारिक न होने के कारण यह पद्धती किसान व समाज के लिए भी हितकारी नहीं है। इसलिए कहा जा सकता है कि रासायानिक कृषि पद्धती टिकाऊ नहीं है।

जैविक खेती: जैविक कृषि का इतिहास हमेशा ही विवादास्पद रहा है (Rigby and Cáceres 2001)। बहुत से लोगों द्वारा इसे खाद्य उत्पादन के लिए एक असक्षम तरीका भी माना जाता रहा है। परम्परागत रासायानिक खेती की तुलना में जैविक खेती में लगभग 8 से 20 प्रतिशत उत्पादन कम होता है (Edwards-Jones and Howells 2001, Mäder et al. 2002, Ponisio et al. 2015, Reganold and Wachter 2016) साथ ही जैविक खेती रासायानिक खेती से भी मंहगी है। जैविक खेती में उपज लेने के लिए ज्यादा लागत पूँजी खर्च होने के साथ फसल सुरक्षा में उपयोग किए जाने वाले अधिकांश यौगिकों को गैर-नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त किया जाता है और उपयोग करने से पहले प्रसंस्करण और परिवहन लागतें ज्यादा होती हैं। जैविक उत्पादों की माँग तो है लेकिन कम उत्पादन व लागत मूल्य अधिक होने कारण बहुत से परिवारों की पहुंच से दूर है। इसलिए कहा जा सकता है कि जैविक खेती टिकाऊ नहीं है (Edwards-Jones and Howells 2001, Reganold and Wachter 2016)। रासायानिक खेती की तुलना में जैविक खेती के उत्पादों में हानिकारक कीटनाशकों के अवशेष कम मात्रा में होते हैं (Brandt and Molgaard 2001), लेकिन शोध यह भी बताते हैं कि जैविक उत्पाद भी कम जहरीले नहीं हैं (Edwards-Jones and Howells 2001)। वित्तीय रूप से जैविक कृषि भी व्यवहारिक नही है। इसलिए यह पद्धती किसान व देश के लिए भी हितकारी नहीं होने के कारण कहा जा सकता है कि जैविक कृषि पद्धती भी टिकाऊ नहीं है।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती: जीरो बजट प्राकृतिक खेती के अन्तर्गत फसल की उपज कम होती ही नहीं है और फसल में किसी भी प्रकार का रासायन या कीटनाशक नहीं डालना होता है। तो इसका अर्थ है कि लागत मूल्य कम होने के साथ-साथ उत्पादित उत्पादों में हानिकारक रासायनों के अवशेष होने का प्रश्न ही नहीं उठता है। बाजार से खरीदकर कुछ नहीं डालना, तो यह वित्तीय रूप से व्यवहारिक भी है। इसलिए यह पद्धती किसान व समाज के लिए हितकारी होने के साथ-साथ टिकाऊ भी है।

टिकना तेरी फितरत नहीं

टिकने की सोच भी सकता है कैसे

सोच भी ले तो टिकने कौन देता है तुझे

हाँ इतना अवश्य है कि

तू टिकेगा तो देश भी टिकेगा

 

- किसान

साभार: डा. जगवीर रावत, (सह-प्राध्यापक - पशु चिकित्सा माइक्रोबायोलॉजी विभाग, लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार - 125004, हरियाणा, भारत) के मार्गदर्शन के लिए लेखक आभारी हैं।

डा. जे.एन. भाटिया, प्रधान कृषि वैज्ञानिक, चौ.च.सिं. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार का लेखन शोधन एवं संशोधन के लिए लेखक आभारी हैं।

References 

Brandt K. and Molgaard J.P., 2001, “Organic agriculture: does it enhance or reduce the nutritional value of plant foods?,” Journal of the Science of Food and Agriculture; 81(9): 924-931.[Web Reference]

Edwards-Jones G. and Howells O., 2001, “The origin and hazard of inputs to crop protection in organic farming systems: are they sustainable?,” Agricultural Systems; 67(1): 31-47. [Web Reference]

Mäder P., et al., 2002, “Soil fertility and biodiversity in organic farming,” Science; 296(5573): 1694-1697. [Web Reference]

National Research Council, 2010, “Toward sustainable agricultural systems in the 21st century,” National Academies Press, Washington D.C. [Web Reference; Book: Web Reference]

Ponisio L.C., et al., 2014, “Diversification practices reduce organic to conventional yield gap,” Proceedings of the Royal Society B; 282(1799). [Web Reference]

Reganold J.P. and Wachter J.M., 2016, “Organic agriculture in the twenty-first century,” Nature Plants; 2: 1-18. [Web Reference]

Rigby D. and Cáceres D., 2001, “Organic farming and the sustainability of agricultural systems,” Agricultural systems; 68(1): 21-40. [Web Reference]

धर्मबीर यादव एवं जयनारायण भाटिया, 2003, “टिकाऊ कृषि हेतु वर्मी-कल्चर,” कृषि विज्ञान केन्द्र, कैथल; विस्तार शिक्षा निदेशालय, चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार - हरियाणा।

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