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जीरो बजट प्राकृतिक खेती के आध्यात्मिक मूलतत्त्व

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बचपन में सुनी एक कहानी के अनुसार गाँव में एक किसान ने साहूकार को एक रूपये का कर्ज देना था। जब किसान के पास कर्ज उतारने के लिए एक रूपय हुआ तो वह साहूकार के पास गया और कहा कि आपको मैनें कितने पैसे देने हैं। तब साहूकार ने अपना बही-खाता देखा तो बताया कि एक रूपया देना है। और साथ ही उसने किसान को कहा कि एक नीचे जीरो लिख दूं तो किसान ने कहा कि लिख दो, तो साहूकार ने एक नीचे एक जीरो लिख दी। इसी प्रकार साहूकार फिर कहा कि एक जीरो और लिख दूं तो इस बार भी किसान ने कहा कि लिख दो तो उसने एक जीरो अैर लिख दी और कहा कि अब आपने मुझे 100 रूपये देने हैं। इस पर किसान ने कहा कि मैं भी कुछ करना चाहता हूँ तो साहूकार ने कहा कि लो कर लो क्योंकि उसने सोचा था कि यह तो अनपढ़ है, कुछ लिख-पढ़ सकता ही नहीं। किसान ने एक के अंक के ऊपर दशमलव का बिन्दु लगा दिया और कहा कि मैंनें आपके दस पैसे देने हैं।

इस कहानी में कितनी सच्चाई है लेकिन इस छोटी सी कहानी से यह बात तो अवश्य ही स्पष्ट होती है कि सही शिक्षा के बिना जीवन अवश्य ही अधूरा होता है। स्वामी विवेकानन्द जी ने भारत में व्याप्त गरीबी की गहराई और अभाव की समस्याओं को ठीक से पहचाना व समझा था। इसलिए उन्होने कृषि के उत्तम और आधुनिक तरीके के महत्त्व पर बल दिया (शानमुखन 2017)।

स्वामी विवेकानन्द जी ने भी कृषि के उत्तम और आधुनिक तरीके के महत्त्व पर बल दिया है। यह तभी संभव हो सकता है, जब किसान पढ़ा-लिखा हो। स्वामी विवेकानन्द जी के त्रिसूत्रि कार्यों में से ‘अधिक से अधिक लोगों को शिक्षा प्रदान करना’ किसान व गाँव (देश) के लिए सही है। इसी सूत्र के द्वारा ही उन्हे अपने अधिकारों का आभास होगा और मन के अंधेरे का विनाश होगा (शानमुखन 2017)।

कृषि दर्शन मोटे तौर पर एवं लगभग दार्शनिक ढाँचे (या नैतिक दुनिया के विचारों) की सुव्यवस्थित एवं अनुशासनात्मक आलोचना के प्रति समर्पित कृषि की भलाई में सही फैसले की आधारशिला है। कृषि दर्शन के अनुसार जिस तकनीक को हम स्वीकार ‌‌‌करते हैं, तो हमें मालूम होना चाहिए कि क्या वह तकनीक ज्ञान है, विज्ञान है, सत्य है, धर्म है और क्या वह अहिंसा पर निर्भर है? यदि हम इन पाँच तत्त्वों के आधार पर उस तकनीक को जानते हैं, और इसको परखते हैं तो इसका अर्थ है कि हम उस तकनीक को जानते हैं। कृषि दर्शन के संबंध में यदि कहा जाए कि क्या किसान इनके बारे में जानता है तो वह सही अर्थों में कृषि दर्शन को जानता व जानकारी के अनुसार उसका पालन भी करता है। इन पाँच तत्त्वों - ज्ञान, विज्ञान, सत्य, धर्म और अहिंसा को कृषि दर्शन में समाहित करके इस प्रकार आंकलन करें।

ज्ञान: ‘इन्द्रिय गोचर महति’। हमारे शरीर में पाँच प्रकार की इन्द्रियां (आँख, त्वचा, कान, नाक, और जीव्हा) हैं जो हमें किसी घटना या घटनाक्रम के बारे में या वस्तु के बारे में, जो जानकारी देती हैं। गोचर का अर्थ है ‘चलना’ अर्थात कोई घटना घट रही है। महति का अर्थ है ‘महत्त्वपूर्ण’। एक घटना घट (चल) रही है, उसको आप देख या महसूस (इन्द्रिय) कर रहे हैं, यही महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार ‘इन्द्रिय गोचर महति’ का अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि शरीर की इन्द्रियों द्वारा देखी अथवा महसूस की गई घटना ही महत्त्वपूर्ण है। इसी का बोध होना ही ज्ञान है। इसको आप एक उद्दाहरण से समझें। इसमें आप आपने-आपको ‘मैं’ से सम्बोधित करके देखें।

“मैं (आप) एक जंगल में गया। जंगल में मैनें, अनगिनत फलों से लदा हुआ एक विशालकाय वृक्ष देखा और जिसके फलों का रंग हरा है। इसका ज्ञान मुझे मेरी पाँच इन्द्रियों में से मेरी आँखों ने मुझे यह सब बताया। कौतूलवश मैने एक कच्चा, हरा फल तोड़ा और अपने हाथों-अंगुलियों से दबाया तो मेरी त्वचा ने बताया कि यह सख्त है, यह मुलायम नहीं है। जब मैनें उस फल को अपने कानों के पास हिलाया तो अन्दर से आवज नहीं आयी तो मेरे कानों ने बताया कि बहुत सख्त है। जब मैनें, फल को नाक से सूंघा तो पता चला कि इसकी सुगन्ध खट्टी है। जब खाकर देखा तो जिव्हा ने बताया कि यह तो बहुत खट्टा है।”

इसका अर्थ यह है कि फल के बारे में आपको जो यथावत जानकारी आपकी इन पाँचों इन्द्रियों ने आपको दी है। यही यथावत जानकारी ही ‘ज्ञान’ है।

विज्ञान: पंद्रह दिन बाद जब मैं वहाँ गया तो देखा कि बदलाव आ गया है। मेरी आँखों ने मुझे बताया कि पंद्रह दिन पहले जो फल हरे रंग के थे, तो अब पीले पड़ चुके हैं। कौतूलवश एक पीला फल तोड़ा उसको अंगंलियों से दबाया तो मेरी अंगुलियों ‌‌‌की त्वचा ने मुझे बताया कि ‌‌‌ये नरम पड़ गया है, ये सख्त नहीं है, कानों के पास हिलाया तो कानों ने बताया कि गुठली अलग हो गयी है, अन्दर से आवाज आ रही है। नाक से सुघा, तो नाक ने बताया मधुर सुगन्ध है। जब खाकर देखा तो मेरी जीव्हा ने बताया कि मधुर स्वाद है, मीठा है। ये जानकारी मुझे मेरी पाँच इन्द्रियों ने दी।

लेकिन ज्ञान की सीमा होती है। फल के पकने 15 दिनों के उपरान्त जो फल हरा था, पीला कैसे पड़ गया, जो फल खट्टा था, वह मीठा कैसे बन गया? इस दौरान ऐसी कौन सी क्रिया घट गई। इसका मुझे ज्ञान नहीं। क्योंकि फल के अन्दर की जानकारी मेरी पाचँ इन्द्रिय नहीं दे सकती। इसका अर्थ है कि ज्ञान की भी सीमा है। जहाँ ज्ञान की सीमा समाप्त होती है, वहाँ ‘विज्ञान’ या अर्न्तज्ञान ही पहुंच सकता है। अन्दर की जानकारी देने वाला विज्ञान है। विज्ञान यह बताता है कि फल क्यों पका है। लेकिन विज्ञान की भी सीमा है। विज्ञान वही बात बता सकता है, जो प्रकृति में अस्तित्व में हैं। वैज्ञानिक वही खोज सकता है, जो वास्तव में है। जो नहीं है, उसे नहीं खोज सकता। इसका अर्थ है कि जो प्रकृति में है वही ज्ञान है, वही विज्ञान है।

‌‌‌सत्य: इस प्रकार सत्य भी वही जो प्रकृति के अस्तित्व में है, वही सत्य है। ‌‌‌इसका अर्थ है ज्ञान व विज्ञान सत्य है। और जो प्रकृति के अस्तित्व मे नहीं है, वही अज्ञान है, अविज्ञान है, असत्य है।

धर्म: धर्म का अर्थ है कि सन्त जिस मार्ग से चलेंगे, वही धर्म है। इसी प्रकार विभिन्न धर्म विभिन्न परिभाषाएं देते हैं। लेकिन सभी धर्मों की भिन्न-भिन्न परिभषाएं हैं। एक जैसी नहीं हैं। लेकिन आमजन यही कहेगा कि सत्य ही धर्म है। इसका अर्थ है कि जो प्रकृति के अस्तित्व में है, वही ज्ञान है, वही विज्ञान है, वही सत्य है, वही धर्म है। जो प्रकृति के अस्तित्व में नहीं है वह वही अज्ञान है, अविज्ञान है, असत्य है, अधर्म है।

‌‌‌अहिंसा: प्रकृति ने अनेक प्राणियों को अनेक खाद्य श्रृंखलाओं में बांट दिया है। लेकिन मानव इनमें किसी भी श्रृंखला में नही है। प्रकृति के दो विधान हैं:

1. शाकाहारी केवल शाकाहार ही करेगा। शाकाहारी किसी भी हालत में माँसाहार नहीं करेगा।

2. माँसाहारी प्राणी केवल शाकाहारी जीवों को ही खाएगा। किसी भी सूरत एक माँसाहारी दूसरे माँसाहारी को नहीं खाएगा।

मानव को छोड़कर, सभी प्राणी इस विधान का पालन करते हैं। एक मानव ही है जो प्रकृति के कानून को तोड़ता है। वह प्रकृति के विरूध बगावत करता है और स्वयं को आद्यात्मिक कहता है। प्रकृति ने मानवक को शुद्ध शाकाहारी के रूप में विकसित किया है। मानव की सारी शरीर सरंचना ही शुद्ध शाकाहारी की है। क्योंकि हमारे पूर्वज वानर भी शुद्ध शाकाहारी ही हैं, तो मानव कैसे माँसाहारी हो सकता है। इसलिए प्रकृति के विधान के अनुसार मानव को शुद्ध शाकाहारी ही रहना चाहिए। यदि मानव शुद्ध शाकाहारी है तो वह आद्यात्मिक है अन्यथा आद्यात्मिक हो ही नहीं सकता। क्योंकि इससे वह प्रकृति का कानून तोड़ता है, उससे भगावत करता है, उसके खिलाफ कार्य करता है।

शाकाहारी का माँसाहारी होना ही हिंसा है। इसलिए जो प्रकृति के अस्तित्व में है, वही ज्ञान है, वही विज्ञान है, वही सत्य है, वही धर्म है और वही अहिंसा है। और जो प्रकृति के अस्तित्व में नहीं है, वही अज्ञान है, वही अविज्ञान है, वही असत्य है, वही अधर्म है और वही हिंसा है।

घने जंगल में प्रकृति का संविधान है, वही प्रकृति है। जो इस प्रकृति के अस्तित्व में है वही प्रकृति का विधान है। अब आप इसे अपनी कृषि में समझने की कोशिश करें।

रासायनिक खेती: अब जंगल के उस पेड़ के पास जाईये और देखियेगा कि क्या उसकी ट्रैक्टर के साथ जुताई है, फिर भी उस पर अनगिनत फल हैं। क्या उसके पास गोबर की खाद डाली जाती है, फिर उसके ऊपर अनगिनत फल हैं। क्या वहाँ यूरिया, डी.ए.पी. डाला जाता है, नहीं फिर अनगिनत फल हैं। क्या वहाँ दवाओं का छिड़काव होता है, नहीं, फिर भी अनगिनत फल हैं। इसका अर्थ है कि प्रकृति में रासायनिक खेती का अस्तित्व नहीं है। इसका अर्थ है कि जो रासायनिक खेती करता है, वह प्रकृति के विधान का भी पालन नहीं करता है। ‌‌‌इसका अर्थ है कि वह आद्यात्मिक नहीं हो सकता है।

जैविक खेती: उस पेड़ के पास कम्पोस्ट नहीं मिलेगा, वर्मीकम्पोस्ट की फैक्ट्री भी नहीं मिलेगी। वहाँ जिंक का खाद भी नहीं मिेलेगा। इसका अर्थ वहाँ पर जैविक खेती का भी अस्तित्व नहीं है। उस पेड़ के पास पंचगव्य के इस्तेमाल का भी निशान नहीं मिलेगा।

वैदिक खेती: वहाँ अग्निहोत्रा नहीं जलाया जाता। इसका अर्थ है कि वैदिक खेती भी ज्ञान नहीं है, विज्ञान नहीं है, सत्य नहीं है, धर्म नहीं है।

यौगिक खेती: उस फलों से लदे पेड़ के पास यौगिक खेती के भी निशान नहीं हैं, योग साधना नहीं है, फिर भी उस पेड़ पर अनगिनत फल हैं। इसका अर्थ है कि वैदिक खेती भी ज्ञान नहीं है, विज्ञान नहीं है, सत्य नहीं है, धर्म नहीं है।

‌‌‌इसका अर्थ है कि हम जो भी पद्धतियाँ उपयोग कर रहे हैं, यदि यह अज्ञान है, अविज्ञान है, असत्य है, अधर्म है और हिंसा है, तो ऐसी पद्धतियाँ स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। जब ये पद्धतियाँ स्वीकार्य नहीं है तो फिर कौन सी पद्धतियाँ हम स्वीकार करेंगें? प्रकृति के विधान में एक ही पद्धति है, और वह है ‘प्राकृतिक खेती’ जिसको आप ‘शून्य लागत आद्यात्मिक खेती’ भी कह सकते हैं ।

जंगल के पेड़-पौधे, मानव की सहायता के बिना अनगिनत फल हर वर्ष देते हैं। इसका अर्थ है कि प्रकृति की एक स्वयं-पोषी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से सारे खाद्य तत्व उनको अपने-आप उन पेड़-पौधों को मिल जाते हैं।

‌‌‌कोई भी पौधा तीन जगहों से पोषक तत्त्व लेता है।

1. हवा से कार्बन-डाईऑक्साईड, नाइट्रोजन लेता है।

2. सूर्य की रोशनी से सौर-ऊर्जा और ‌‌‌आकाश से ब्रह्माण्ड ऊर्जा लेता है। ब्रह्माण्ड ऊर्जा को गुप्त ऊर्जा (Dark energy) भी कहते हैं, यह ऊर्जा का एक काल्पनिक रूप है जो सम्पूर्ण अंतरिक्ष में व्याप्त है। ‌‌‌इसको ब्रह्मांड के कुल ऊर्जा-द्रव्यमान का 74% माना जाता है।

3. जड़ों के माध्यम से भूमि में से पानी लेता है।

‌‌‌मनुष्य के जीवन का मूल आधार कृषि है। पौधों सहित ‌‌‌हर जीव के पाँच मूल तत्व अर्थात पंचतत्व, यानि भूमि, गगन अर्थात आकाश, वायु अर्थात हवा, अग्नि अथवा तेज (सूर्य), नीर अथवा जल इत्यादि हैं। मानव हो या पशु-पक्षी या फिर पेड़-पौधे, सब में इन पाँच तत्वों का वास है। किसी में कोई एक तत्व प्रधान है, तो किसी में कोई दूसरा। जैसे मछली के लिए जल तत्व प्रधान है, तो पेड़-पौधों के लिए धरती। इसके बिना वे जीवित नहीं रह सकते। मानव भी वायु के बिना कुछ मिनट, जल के बिना कुछ दिन, अन्न के बिना कुछ महीने, अग्नि अर्थात ऊर्जा और आकाश अर्थात खालीपन के बिना भी कुछ दिन ही चल सकता है; पर इसके बाद उसे भी यह संसार छोड़ना पड़ता है।

प्राकृतिक कृषि का अर्थ है पंचतत्वों के संतुलन से बनाकर की गई कृषि। अन्न, सब्जी, फल, औषधीय पौधे या कुछ और; सबको इन पांचों तत्त्वों की आवश्यकता है। भूमि पर ये सभी पेड़-पौधे उगते हैं। समय-समय पर इन्हें पानी चाहिए। कुछ वर्षा से संतुष्ट हो जाते हैं, तो कुछ को सिंचाई द्वारा अतिरिक्त पानी देना पड़ता है। हवा तो सबको चाहिए ही। नोबेल विजेता डा. जगदीश चंद्र बसु ने सिद्ध किया है कि पेड़-पौधे भी जीवित इकाई हैं। रात में पेड़ कार्बन छोड़ते हैं, इसलिए उनके नीचे सोना मना है। वायुविहीन निर्वात क्षेत्र में कोई पौधा नहीं उग सकता।

अग्नि अर्थात सूर्य की गर्मी से ही वनस्पतियां पकती हैं। कुछ को अधिक गर्मी चाहिए, तो कुछ को कम।

आकाश अर्थात खालीपन है। सभी पेड़-पौधों को एक निश्चित दूरी पर लगाया जाता है, जिससे वे अपनी क्षमता के अनुसार बढ़ सकें। केले के पेड़ों के बीच जितनी दूरी चाहिए, उतनी दूरी से आम का काम नहीं चलता। बरगद को इससे भी कई गुना जगह चाहिए। गेहूं, धान, सब्जियां या दालें कम जगह में ही काम चला लेती हैं; पर बिल्कुल सटकर पौधे नहीं पनपते। उन्हें खाली स्थान की जरूरत होती ही है।

अब हवा की बात करें। तीव्र वाहन और उद्योग जो जहरीला धुआं उगल रहे हैं, वही हमें और पेड़-पौधों को मिल रहा है। दिल्ली में एक न्यायाधीश ने सरकार से पूछा कि हम अपने बच्चों को लेकर कहां जाएं, जिससे वे गंदी हवा और शोर से बच सकें? अब हर गाड़ी वातानुकूलित (A.C.) ही आ रही है (विजय कुमार 2015)। गर्मियों में किसी लाल बत्ती पर जब ये गाड़ियां रुकती हैं, तो वहां खड़े साइकिल, रिक्शा, स्कूटर, मोटर साइकिल या पैदल चलने वालों की हालत खराब हो जाती है। अब पानी के फिल्टर की तरह हवा के फिल्टर भी आने लगे हैं। पैसे वाले अपने घर, कार्यालय और गाड़ियों में इन्हें लगा रहे हैं; पर आम आदमी और पेड़-पौधे भगवान की दया पर निर्भर हैं।

कृषि दर्शन को समझकर की जाने वाली कृषि ही सही अर्थों में ज्ञान है, विज्ञान है, सत्य है, धर्म है और यही अहिंसा भी है। ‌‌‌इन्ही पाँचों तत्त्वों का हम समरण रखें और ‘जीयो और जीने दो’ के सिद्धान्त पर चलें ताकि हमारा भारतवर्ष सदा अग्रसर रहे, हम बुलन्दियों को छुएं। किसी को भी पीछे न छोड़ें, साथ-साथ आगे बढ़ते चलें।

‌‌‌अधिक जानकारी के लिए ‌‌‌जीरो बजट प्राकृतिक खेती के प्रणेता पद्धमश्री कृषि संत श्री सुभाष पालेकर जी का साहित्य पढ़ें। [Web Reference]

सभार: डा. जगवीर रावत, (सह-प्राध्यापक - पशु चिकित्सा माइक्रोबायोलॉजी विभाग, लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार - 125004, हरियाणा, भारत) के मार्गदर्शन के लिए लेखक आभारी हैं।

संदर्भ

अज्ञात “गुप्त ऊर्जा,” मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया; assessed on April 9, 2017. [Web Reference]

अज्ञात, “पर्यावरण: पंच तत्वों में संतुलन बनाए रखने की चेतना पंचतत्व का भैरव नर्तन,” राज एक्सप्रेस; assessed on January 02, 2018. [Web Reference]

विजय कुमार, 2015, “जैविक कृषि एवं पंचतत्व,” विजय पथ; assessed on April 9, 2017. [Web Reference]

शानमुखन के.के., 2017, “स्वामी विवेकानन्द – For Students,” सुरूचि प्रकाशन, नई दिल्ली - 110 055. [Web Reference]

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