Home | Poison Free Agriculture Farming | मृदा और इसका निर्माण

Sections

Newsletter
Email:
Poll: Like Our New Look?
Do you like our new look & feel?

मृदा और इसका निर्माण

Font size: Decrease font Enlarge font

प्रकृति का पोषणशास्त्रमृदा और इसका निर्माण; भूमि का गिरता स्वास्थ्यभूमि अन्नपूर्णा हैखाद्य चक्र; केशाकर्षक शक्तिचक्रवात; केंचुए - किसान के हलधरसूक्ष्म पर्यावरणजैविक व अजैविक घटक एवं पर्यायवरण के मध्य अन्त:क्रिया

-----------------------------------------------------

 स्थलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में निर्धारित बहुसंख्यक प्रकाश संश्लेषक कार्बन के रूप में मृदा अंतिम दशा है जिसका कुछ भाग नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है (Rodríguez-Murillo 2001)। इस मृदा में मौजूद कार्बन का कुछ हिस्सा वायुमण्डल में चला जाता है। लेकिन समुद्र व वायुमण्डल में जाने के बाद भी मृदा में मौजूद अधिकांश कार्बन भाग ही भूमि में कार्बन भण्डारण में सहायक होता है। भूमि में मौजूद यही कार्बन ही भूमि के भौतिक और रासायनिक विशेषताओं में मुख्य भूमिका निभाती करती है व भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मुख्य है।

मृदा, जैव तथा अजैव पदार्थों की एक परिवर्तनशील और विकासशील पतली परत है, जो भूपृष्ठ को ढके हुए है। यह वानस्पतिक आवरण को बनाए रखने में मदद देती है। इसमें विभिन्न परतें होती हैं, जो मूल शैल में भौतिक, रासायनिक और जैविक अपक्षय (weathering) की प्रक्रियाओं द्वारा बनती हैं।

‌‌‌अपक्षय (Weathering): अपने रंग, बनावट, या संरचना को बदलने या उसके किनारों को गोल करने में एक चट्टान पर तत्वों की क्रिया को अपक्षय कहते हैं। (The action of the elements on a rock in altering its color, texture, or composition, or in rounding off its edges)

मृदा निर्माण के कारक (Factors of soil formation): मृदा निर्माण को नियन्त्रित करने वाले पाँच कारकों में मूल शैल (Parent rock), उच्चावच (Relief), समय (Time), जलवायु (Climate) तथा जैविक तत्व (Plant and Animal Organisms) शामिल हैं। पहले तीन कारकों को निष्क्रिय कारक (Passive factors) तथा अन्तिम दो कारकों को क्रियाशील कारक (Active factors) कहते हैं। आधारी शैल (Parent material) तथा जलवायु मृदा निर्माण के दो महत्वपूर्ण कारक हैं, क्योंकि ये अन्य कारकों को प्रभावित करते हैं।

‌‌‌क. मूल शैल (Parent rock):- मृदा अपने नीचे स्थित विभिन्न खनिजों से युक्त शैल या मूल शैल 7 पदार्थों से निर्मित होती है। मूल शैल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती है, तथा भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं द्वारा अपघटित (Decomposed) हो जाती है। इससे मृदा के अजैव खनिज कणों का निर्माण होता है। मूल शैल मृदा निर्माण में लगने वाले समय, उसके रासायनिक संघटन, रंग, गठन, बनावट खनिज अंश तथा उर्वरता को भी प्रभावित करती है।

ख. उच्चावच (Relief):- किसी क्षेत्रों की स्थलाकृति मूल शैल पदार्थों के अपरदन (Erosion) की मात्रा तथा वहां बहने वाले जल की गति को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार मृदा निर्माण में सहायक प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उच्चावच से प्रभावित होती हैं। तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में जल तेजी से बहता है। इसके विपरीत मन्द ढालों पर जल की गति धीमी होती है। इसलिए तीव्र ढालों वाले क्षेत्रों की भूमि में पानी का रिसाव कम होता है, जिससे मृदा निर्माण की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। तीव्र ढालों पर अपरदन अधिक तेजी से होता है। इससे मृदा निर्माण में बाधा पड़ती है। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पतली परत वाली कम उपजाऊ मृदा का निर्माणा होता है। मैदानी क्षेत्रों में पूर्ण विकसित उपजाऊ मृदा का निर्माण होता है।

‌‌‌ग. समय (Time): - मृदा का निर्माण बहुत धीरे-धीरे होता है। पूर्ण रूप से विकसित मृदा (Developed soil) का निर्माण तभी होता है; जब भौतिक (Physical), रासायनिक (Chemical) और जैविक (Biological) प्रक्रियाएँ (Processes) बहुत लंबे समय तक कार्य करती हैं।

‌‌‌घ. जलवायु (Climate):- मृदा निर्माण (Soil formation) की प्रक्रिया में जलवायु सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारक है। जलवायु न केवल समय की ‌‌‌लम्बी अवधि में मूल शैल (Parent material) पदार्थों के कारण मृदा में उत्पन्न अन्तरों को कम करती है; अपितु मृदा में होने वाली जैविक प्रक्रियाओं (Biological activities) को भी प्रभावित करती है। इस कारण एक प्रकार की जलवायु वाले प्रदेशों में दो विभिन्न प्रकार के मूल शैल पदार्थों के द्वारा एक ही प्रकार की मृदा का निर्माण होता है।

किसी प्रदेश में अपक्षय (Weathering) की प्रक्रिया, इसके प्रभाव तथा वनस्पति और जीवों के प्रकार का सीधा संबंध ऋतुओं के अनुसार बदलते तापमान (Temperature) तथा इसके वितरण (Distribution) और वर्षण (Nature of precipitation) के साथ है। इस प्रकार जलवायु (Climate) मृदा (Soil) निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

‌‌‌मृदा निर्माण के कारक

 . वनस्पति तथा जीव (Plant and Animal Organisms):- मूल शैल पदार्थों पर विकसित मृदा की गुणवत्ता में वहाँ के पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तुओं की सक्रिय भूमिका होती हैं। मृत पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं से मृदा का जैविक अंश बनता है। अपघटन व जैविक प्रक्रियाओं के सहयोग से जैव पदार्थ ह्यूमस (Humus) के रूप में बदल जाते हैं। ह्यूमस से ही मृदा उपजाऊ बनती है। इसके द्वारा मृदा की जल धारण करने की क्षमता में ‌‌‌वृद्धि होती है। मृदा इसी जैविक पदार्थ के द्वारा वनस्पति का पोषण करती है। इसके बदले में वनस्पति का आवरण मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत की अपरदन (Erosion) से रक्षा करती है। वनस्पति का आवरण वर्षा के जल को बहने से रोकता है और उसे मृदा की निचली परतों में रिसने के लिए मजबूर करता है। इस आवरण से मृदा की नमी का वाष्पीकरण भी कम होता है। इस प्रकार उपजाऊ और विकसित मृदा बनने में सहायता मिलती है।

मृदा की संस्तर/ ‌‌‌स्तरीय स्थितियाँ (Soil horizon conditions)

एक मृदा की परत जो ‌‌‌लगभग धरातल के समानन्तर होती है तथा जिसमें मृदा के विशिष्ट गुण होते हैं उसे मृदा की संस्तर स्थिति कहते हैं। मृदा संस्तर मृदा में मृदा की सुस्पष्ट परतें होती हैं जो भौतिक और रासायनिक संघटन, जैविक पदार्थ और संरचना में एक दूसरे से भिन्न होती हैं। मृदा संस्तरों को दर्शाने वाली परिच्छेदका को मृदा परिच्छेदिका (Soil profile) कहते हैं।

‌‌‌‌‌‌मृदा परिच्छेदिका (Soil profile): ‌‌‌‌‌‌मृदा परिच्छेदिका मृदा की विभिन्न परतों के विन्यास को कहते हैं। ये परतें भौतिक, रासायनिक और जैविक तत्वों के आधार पर एक दूसरे से भिन्न होती हैं। ‌‌‌ये मृदा परतें या संस्तर इस प्रकार हैं:

1. ऊपरी मृदा (Top soil): मृदा की ऊपरी परत में अविघटित व विघटित कार्बन के कण होने के कारण इसमें ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है। इन कार्बन के कणों के कारण ही ऊपरी मृदा का रंग काला होता है। कार्बन से भरपूर ऊपरी मृदा ही फसल ऊगाने में सहायक होती है।

‌‌‌2. उप-मृदा (Sub soil): ऊपरी मृदा के नीचे की परत को उप-मृदा कहते हैं। वास्तव में यह निक्षालन क्रिया (Elutriation) की परत होती है। इस क्रिया में चूना (Clay) मिट्टी के कण और एल्यूमीनियम व लोहे के आक्साइड कण उप-मृदा से पानी के साथ रिसकर अध:-स्तर में चले जाते हैं और उप-मृदा में शुद्ध रेत के कण या मोटी गाद के कण शेष रह जाते हैं।

ऊपरी व उप-मृदा स्तर मृदा का मुख्य भाग हैं।

‌‌‌3. अध:स्तर (Substratum): वास्तव में मूल शैल का अपक्षयित भाग है। इस परत का रंग उप-मृदा की अपेक्षा कुछ अधिक काला होता है, क्योंकि इस मृदा में ह्यूमस या खनिजों के बहुत ही महीन कण होते हैं। ‌‌‌अध:स्तर में ऊपरी व उप-मृदा से छनकर आये चूना मिट्टी, एल्यूमीनियम व लोहे के आक्साइड कण व अन्य जैविय पदार्थों के कण होते हैं।

‌‌4. ‌मूल शैल (Unweathered parent stock): यह मृदा परिच्छेदिका की सबसे नीचे की परत होती है जिसमें अपक्षय (Weathering) नहीं होता है। ‌‌‌इसको मृदा का भाग नहीं माना जाता है। ‌‌‌यह खनिज तत्वों का मुख्य भण्डार है।

‌‌‌प्राकृति का पोषण

‌‌‌आधुनिक (रासायनिक) कृषि में उत्पादन तभी तक बढ़ता है जब तक आप उसमें निवेश बढ़ाते रहते हैं। इसमें केवल आपको कुछ ज्यादा पाने के लिए ज्यादा ही निवेश करना पड़ता है। जब निवेश कम हो जाएगा तो उत्पादन भी कम हो जाएगा। इसमें एक समय आता ही है कि जब आप निवेश के अनुकुल उत्पादन नहीं ले सकते हैं और अन्य आप की निहित सेवा में त्रुटियाँ खोजने लगेंगे लेकिन आपके खेत का उत्पादन नहीं बढ़ा पाएंगे। आपका खर्च भी बढ़ेगा लेकिन आमदनी उस अनुरूप में नहीं होगी। आप निर्धन हो जाओगे। ‌‌‌हम दूसरे के सहयोग से कृषि करते आए हैं, हमने कभी मंथन करने की कोशिश नहीं की। जैसा किसी ने कहा वैसा हमने अपने खेत में कर लिया। आज हालात यह है कि खेत में अनाज पैदा करने वाला स्वयं भी भूखा रह जाता है। लेकिन क्यों?

‌‌‌क्योंकि किसान नहीं जानता कि भूमि अन्नापूर्णा है, वह नहीं जानता कि खाद्य चक्र, केशाकर्षण शक्ति, चक्रवात, देशी केंचओं का कार्य व सूक्ष्म पर्यायवरण क्या है? ‌‌‌इसलिए किसान को समझना होगा कि वह स्वयं भी भूखा नहीं रहे व दूसरों को भी अन्न प्रदान करता रहे। भूमि अन्नापूर्णा है, उसे जानना होगा कि खाद्य चक्र, केशाकर्षण शक्ति, चक्रवात, देशी केंचओं का कार्य व सूक्ष्म पर्यायवरण क्या है।

Rate this article
0