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प्रकृति का पोषणशास्त्र

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प्रकृति का पोषणशास्त्रमृदा और इसका निर्माणभूमि का गिरता स्वास्थ्यभूमि अन्नपूर्णा हैखाद्य चक्र; केशाकर्षक शक्तिचक्रवात; केंचुए - किसान के हलधरसूक्ष्म पर्यावरणजैविक व अजैविक घटक एवं पर्यायवरण के मध्य अन्त:क्रिया

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‌‌‌कृषि सिर्फ कोई तकनीक नहीं है, अपितु यह जीवन के हर अवयव की दार्शनिकता को अपने में समेटे हुए संपूर्ण जीवन शास्त्र है। आध्यात्मिक कृषि को मात्र भौतिकता की दृष्टि से देखकर सीखा-समझा नहीं जा सकता है बल्कि प्रकृति के पोषण शास्त्र को समझते हुए समझा जा सकता है कि प्रकृति कैसे सभी जीवों का पालन-पोषण करने में सक्षम है। - पद्धमश्री सुभाष पालेकर

गर्भस्थ शिशु पूर्णत: माँ पर निर्भर रहता है। इतना ही नहीं जन्म लेने के बाद भी वह माँ पर ही आश्रित होता है। बच्चे के पैदा होने से पहले उसकी माँ के स्तनों में उसके पोषण के लिए दूध अपने-आप ही बन जाता है। अर्थात, प्राकृतिक घटनाचक्र में जो भी पैदा होता है या जन्म लेता है तो उसके उत्पन्न या पैदा होने से पहले ही प्रकृति उसके पोषण की व्यवस्था भी करती है, जो पहले से ही प्रकृति के पास होती है। जन्म के तुरन्त बाद बच्चा श्वास भी प्रकृति में ही लेता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है प्रकृति उसके खाने-पीने का और प्रबन्ध करती जाती है। उसके भरण-पोषण के लिए भूमि में अन्न पैदा करती है। अपनी सगी माँ के बाद कोई दूसरी माँ है तो सही अर्थों में वह केवल और केवल प्रकृति (भूमि) ही है जो उसका जीवन-यापन करती है। इसलिए भूमि को ‘माँ’ कहा जाए तो इसमें कोई भी अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। भारतीय दर्शनशास्त्र भी यही बताता है कि ‘धरती हमारी माँ है और वह अन्नपूर्णा है’। इसलिए ‘भूमि अन्नापूर्णा है’ के बारे में समझना आवश्यक हो जाता है कि सही अर्थों में भूमि क्या है?

01. मृदा और इसका निर्माण

02. भूमि का गिरता स्वास्थ्य

03. भूमि अन्नपूर्णा है (Land is full of nutrients)

अफसलीय (जंगल के) पेड़-पौधों को आवश्यक पोषक तत्त्व मानव द्वारा उपलब्द्ध नहीं कराए जाते हैं फिर भी उनमें वे सारे आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं जो उनकी वृद्धि के लिए आवश्यक हैं। इसका अर्थ है कि प्रकृति में ऐसी कोई-न-कोई व्यव्स्था अवश्य है जो इनके पोषक तत्त्वों को पूरा करने में सक्षम है। शोधों से ज्ञात होता है कि जैसे-जैसे भूमि की गहराई में जाते हैं तो खाद्य पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ती जाती है। इन आवश्यक पोषक तत्त्वों को गहरी भूमि से पेड़-पौधों को उपलब्द्ध करवाने के लिए निम्नलिखित प्राकृतिक व्यवस्थाएं हैं।

 4.1. खाद्य चक्र (Nutrient cycle)

 4.2. केशाकर्षक शक्ति (Capillary force)

 4.3. चक्रवात (Cyclone)

 4.4. देशी केंचुओं की गतिविधियाँ (Local Earthworm Activities) - केंचुए - किसान के हलधर

 4.5. सूक्ष्म पर्यावरण (Micro climate)

05. जैविक व अजैविक घटक एवं पर्यायवरण के मध्य अन्त:क्रिया

भूख लगे तो माँ उसको शान्त कराए।

जब माँ स्वरूप भूमि को भूख लगे तो उसे कौन शान्त कराए।।

आओ मिलकर हर दिन को नया बनाएं,

परोस कर उसको जहरमुक्त भोजन,

हर दिन माँ की भूख शान्त कराएं।

 अधिक जानकारी के लिए ‌‌‌जीरो बजट प्राकृतिक खेती के प्रणेता पद्धमश्री कृषि संत श्री सुभाष पालेकर जी का साहित्य पढ़ें। [Web Reference]

सभार: डा. जगवीर रावत, (सह-प्राध्यापक - पशु चिकित्सा माइक्रोबायोलॉजी विभाग, लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार - 125004, हरियाणा, भारत) के मार्गदर्शन के लिए लेखक आभारी हैं।

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