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फसल सुरक्षा सूत्र - शक्तिवर्द्धक सप्त-धान्यांकुर अर्क

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जीरो बजट प्राकृतिक खेती के फसल सुरक्षा सूत्रनीमास्त्रअग्नि-अस्त्रब्रह्मास्त्रदशपर्णी अर्क; ‌‌‌नीम मलहमथ्रिप्सरोधीफफूंदनाशक; सप्त-धान्यांकुर अर्क

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प्रकृति ने सभी जीव-जन्तुओं को रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) के रूप में एक अद्भूत वरदान दिया है। यदि रोग प्रतिरोधक क्षमता को ‌‌‌ही बढ़ाया जाए तो  दवाई देने या लेने की आवश्यकता कम ही होगी। ‌‌‌जिस प्रकार रोगजनक (Pathogens) पशुओं और पौधों में अपने-आप को व्यवस्थित करने के लिए लगातार उत्परिवर्तन (Mutation) कर रहे हैं उसी प्रकार जीव-जन्तु भी लगातार इन रोगाणुओं से जूझ रहे हैं। ‌‌‌जीव-जन्तुओं के लगातार संघर्ष के बावजूद ये रोगाणु उन में प्रवेश कर हानि पहुंचाते रहते हैं। ‌‌‌पौधों में रोगजनकों को पहचानने में सरंक्षण और परिवर्तनीय रणनीतियों के माध्यम से अद्भूत क्षमता है और रोगाणओं ने अपने बचाव के लिए रक्षा तन्त्र में विभिन्न प्रकार के बदलाव किये हैं। ‌‌‌‌‌‌रोगाणुओं को नियन्त्रित करने के लिए विभिन्न प्रकार के आधुनिक रोगाणुनाशकों का खूब उपयोग किया जा रहा है। फिर भी इन रोगजनकों से निजात नहीं मिल रही है और इन रोगाणुनाशकों के अवशेष पौधों के माध्यम से मनुष्यों में प्रवेश कर जीवन को हानि पहुंचा रहे हैं। अत: रोगाणुओं के लगातार बढ़ते रक्षा तन्त्र ‌‌‌और बढ़ते विषाक्त पदार्थों को नियन्त्रित करने के लिए फसल सुरक्षा चक्र अनिवार्य हो जाता है। ‌‌‌शुन्य लागत प्राकृतिक खेती पर हुए शोधों से यह ज्ञात होता है कि पौधों की रक्षा प्रणाली में सुधार कर मानवीय जीवन में इन विषाक्त पदार्थों को नियन्त्रित किया जा सकता है।

यदि ‌‌‌फसल को जहरमुक्त करना है तो जिन रोगाणुओं के लिए रोगाणुनाशक रासायनों का उपयोग किया जा रहा उन रोगाणुओं के प्रति रोगप्रतिरोधक क्षमता को पौधों में विकसित करना चाहिए। ‌‌‌‌‌‌यह विधित है कि माँ से बच्चे में रोग-प्रतिरोधक शक्ति का संचारण होता है। उसी प्रकार स्वस्थ भूमि माता भी पौधे रूपी बच्चे को रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। ‌‌‌इसलिए पौधों में प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न करने के लिए अच्छा है कि जिस भूमि या मिट्टी में पौधे या फसल लगानी है उसी भूमि में इतनी रोग प्रतिरोधक शक्ति हो जाए कि उस में उत्पन्न पौधों में अपने-आप ‌‌‌ही रोग प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न हो जाए। भूमि को ‌‌‌रोग प्रतिरोधक शक्ति देने वाला जीवनद्रव्य (Humus) होता है। ‌‌‌आधुनिक कृषि में उपयोग किये जा रहे रसायन इस जीवन द्रव्य को नष्ट करते हैं। अत: जीवनद्रव्य को बचाने के लिए यदि आुधनिक रसायनों की जगह ऐसे पदार्थ भूमि में उपलब्द्ध करवाए जाएं जिससे जीवनद्रव्य नष्ट न हो और उसका निर्माण भी किया जा सके। यह सम्भव है प्राकृतिक खेती में है। प्राकृतिक खेती में खेत या घर में उपलब्द्ध सामग्री का ही उपयोग किया जाता है, बाजार से कुछ भी खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है। ‌‌‌जब ये सभी सामग्रीयाँ घर या खेत में उपलब्द्ध हैं तो बाजार से कुछ नहीं खरीदना है तो इसका अर्थ है शुन्य लागत प्राकृतिक खेती। यह एक कारगर साधन है। ‌‌‌शुन्य लागत प्राकृतिक खेती के अंर्तगत आच्छादन और जीवामृत / घन-जीवामृत के उपयोग से भूमि में ह्यूमस का निर्माण होता है।

सप्तधान्यांकुर अर्क (शक्तिवर्द्धक दवा - टॉनिक)

‌‌‌इसके उपयोग करने से दानों, फल-फलियों, फूलों, सब्जियों पर बहुत अच्छी चमक आती है। आकार, वजन और स्वाद भी बढ़ता है। (Patil 2016)

बनाने के लिए आवश्यक सामग्री

तिल

100 ग्राम

मूँग के दाने

100 ग्राम

उड़द के दाने

100 ग्राम

लोबिया के दाने

100 ग्राम

‌‌‌मोठ/मटकी/मसूर के दाने

100 ग्राम

गेहूँ के दाने

100 ग्राम

देशी चने के दाने

100 ग्राम

पानी

200 लीटर

गौ-मूत्र

10 लीटर

‌‌‌बनाने की विधि

एक छोटी कटोरी में तिल (प्राथमिकता काले तिल को) लेकर उसे पानी उपयुक्त ‌‌‌मात्रा में डाल कर डुबाएं और घर में रख दें।

अगले दिन सुबह एक थोड़ी बड़ी कटोरी में मूँग, उड़द, लोबिया, ‌‌‌मोठ/मटकी/मसूर, गेहूँ, देशी चना के ‌‌‌दानों‌‌‌ को डालकर मिलाएं एवं उपयुक्त मात्रा में पानी डालकर भिगोएं एवं घर में रखें। ‌‌‌24 घण्टे बाद इन अंकुरित बीजों पानी से निकाल कर कपड़े की पोटली में बाँध कर टाँग दें। ‌‌

‌‌‌एक सेंटीमीटर अंकुर निकलने पर उपरोक्त सातों प्रकार के बीजों की सिलबट्टे पर चटनी बनाएं।

‌‌‌सभी प्रकार के बीजों के अलग हुए पानी को सम्भालकर रख लें।

‌‌‌अब 200 लीटर पानी में बीजों से अलग हुए पानी व चटनी और गौ-मूत्र को एक ड्रम में डालकर लकड़ी की डण्डी से अच्छे मिलाकर कपड़े से छान कर 48 घण्टे के अन्दर ‌‌‌इस प्रकार छिड़काव करें।

‌‌‌* फसल के दाने दूग्धावस्था में हों।

* फल-फलियाँबाल्यावस्था में हों।

* फूलों में कली बनने के समय।

* सब्जियों में कटाई के 5 दिन पूर्व छिड़काव करें।

‌‌‌सप्त-धान्यांकुर अर्क का करें उपयोग

भरपूर उत्पादन का करें ‌‌‌उपभोग

संदर्भ

Dodds P.N. and Rathjen J.P., 2010, “Plant immunity: towards an integrated view of plant–pathogen interactions,” Nature Reviews Genetics; 11(8): 539-548. [Web Reference]

Jones J.D.G. and Dangl J.L., 2006, “The plant immune system,” Nature; 444: 323-329. [Web Reference]

Patil R.B., 2016, “Documentation of ITK Practices and Formulations Used in Organic Farming as IPM in Nashik District of Maharashtra,” Pratibha Joshi Indigenous Technologies in Plant Protection; p. 248 ICAR–National Research Centre for Integrated Pest Management, 37. [Web Reference]

सुभाष पालेकर, “जीरो बजट प्राकृतिक (आध्यात्मिक) खेती,” ‌‌‌7 अप्रैल 2017 को ‌‌‌लिया गया। [वेब संदर्भ]

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