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केंचुए - किसान के हलधर

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प्रकृति का पोषणशास्त्रमृदा और इसका निर्माणभूमि का गिरता स्वास्थ्यभूमि अन्नपूर्णा हैखाद्य चक्र; केशाकर्षक शक्तिचक्रवात; केंचुए - किसान के हलधरसूक्ष्म पर्यावरणजैविक व अजैविक घटक एवं पर्यायवरण के मध्य अन्त:क्रिया

केंचुआ लुम्ब्रिसीडी (Lumbricidae) परिवार का उभयलिंगी (Hermaphrodite), भूमि में विचरण करने वाला स्थलीय एनलिड (Annelid) कीड़ा है, जो भूमि में नालियाँ बनाकर वायु संचार करने में सहायक है। यह मिट्टी व विघटित कार्बनिक पदार्थों (Organic matter) को खाकर जीवित रहता है। हलधर का अर्थ है जो खेत की जुताई करता है। पहले हमारे खेतों की जुताई बैल किया करते थे। अब हमारे खेतों में यान्त्रिक/ईंधन चलित ट्रैक्टर आ चुके हैं।

कीड़े-मकोड़े खासतौर पर ‘केंचुएं’ भी हमारे खेतों की जुताई करते हैं। इसलिए इनको भी यदि हलधर कहा जाए तो अतिशियोक्ति नहीं होनी चाहिए। ये केंचुएं अप्रत्याशित तौर पर भूमि के अन्दर जुताई करते रहते हैं। इसलिए इन केंचुओं की भूमिका नगन्य नहीं समझनी चाहिए। अत: हलधर के रूप में केंचुएं के गुणों को समझना आवश्यक है।

केंचुओं से हर किसान चिर-परिचित है। आज किसान केंचुओं से तैयार की जाने वाली वर्मीकम्पोस्ट से भी परिचित है। लेकिन किसान को यह नहीं बताया जाता है कि क्या वर्मीकम्पोस्ट बनाने वाले केंचुए भूमि में कितना हलधर का कार्य कर सकते हैं या कर रहे हैं। यह समझने का विषय है कि कौन हलधर है और कौन नहीं।

केंचुआ तो केंचुआ है लेकिन आज यह चर्चा का विषय चल रहा है कि एक केंचुआ गोबर खाता है तो दूसरा मिट्टी। इनमें से कौन-सा सही अर्थों में केंचुआ है और कौन-सा नहीं। लेकिन एक बात सही है कि हलधर वही है जो भूमि की जुताई करता हो अन्यथा वह हलधर नहीं है। हलधर केंचुआ वही है जो मिट्टी व विघटित कार्बनिक पदार्थों (Organic matter) को खाता है और भूमि में वायु के संचरण को बढ़ाता है और भूमि को उर्वरा शक्ति प्रदान करता हो।

वर्मीकम्पोस्ट बनाने में सहायक केंचुएं को विदेशी केंचुआ कहा जाता है और भूमि में नालियाँ/सुराख बनाकर वायु का संचरण करने वाले केंचुओं को देशी केंचुआ कहा जाता है। इन्हीं देशी केंचुओं को सही अर्थों में हलधर कहा जा सकता है। क्योंकि यही केंचुए भूमि की जुताई करने में सक्षम हैं। इन विेदेशी एवं देशी केंचुओं में अन्तर इस प्रकार है:

विदेशी बनाम देशी केंचुए: विदेशी केंचुओं को इंग्लिश रेडवर्म - Eanglish redworm ‌‌‌(एईसिनिया फेटिडा Eisinia fetida) कहते हैं और देशी केंचुओं को देशी ‘इण्डीजिनस’ (Indigenous) ही कहा जाता है। देशी का अर्थ है जो जहाँ पाया जाता है उस जगह या देश के लिए उसको देशी कहा जाता है। अन्य देश के लिए उसको विदेशी कहा जाता है।

वजन: वयस्क इंग्लिश रेडवर्म का भार 200-300 मि.ग्रा (Flack and Hartenstein 1984) व देशी केंचुए का भार 3.24 ग्राम होता है (Gupta and Sundararaman  1991)।

लम्बाई: इंग्लिश रेडवर्म की लम्बाई 86.5 मि.मी. (Nath, Singh and Singh 2009)जबकि देशी केंचुआ (फेरेटिमा फॉस्थुमा) की लम्बाई 150 मि.मी. होती है।

आहार: इंग्लिश रेडवर्म गोबर एवं काष्ठाहार खाता है मिट्टी नहीं खाता है लेकिन देशी केंचुआ मिट्टी (मिट्टी, बालू, कच्चा पत्थर व चूना पत्थर) व काष्ठाहार खाता है।

विचरण: भूमि पर या भूमि में विचरण करने के अनुसार तीन प्रकार के केंचुए होते हैं: भूमि की सबसे ऊपर धरातल पर (Epigeic), भूमि की ऊपरी सतह पर (endogeic) व भूमि के अन्दर गहराई (Anecic) तक विचरण करने वाले केंचुए (Langmaack et al. 1999)। इनमें भूमि की गहराई तक विचरण करने वाले केंचुए ही महत्त्वपूर्ण हैं।

इंग्लिश रेडवर्म भूमि के ऊपरी धरातल पर विचरण करता है (Garg et al. 2005; Puddephatt 2013)। देशी केंचुएं भूमि की गहराई (15 फुट से भी ज्यादा) में ऊपर-से-नीचे तथा नीचे-से-ऊपर निरन्तर अनन्त छिद्र करता हुआ गतिमान रहता है। इस प्रकार ऊपर-नीचे गतिमान रहने से यह उस भूमि की जुताई करता रहता है।

वायु संचरण: विदेशी केंचुए भूमि की ऊपरी सतह पर ही विचरण करते हैं अत: भूमि में सुराख/नालियाँ नहीं बनाते हैं। जबकि देशी केंचुए भूमि में गहराई तक जाते हैं व छिद्र बनाते हैं जिन में से भूमि में वायु संचरण होता रहता है। वायु संरण से भूमि उर्वरा शक्ति बढ़ती है।

जैव-प्रबोधक: केंचुओं को प्रयोगशाला में जैव प्रबोधक (Bio-monitor) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इंग्लिश रेडवर्म को जैव प्रबोधक के रूप सबसे ज्यादा वरीयता दी जाती है। जैव-प्रबोधक का अर्थ है वह जीव जो यह बताता है कि किस कचरे/भूमि/फसल में कौन-कौन से अपशिष्ट (जैसे कि आर्सेनिक, एल्यूमीनियम, सेलेनियम या अन्य) कितनी मात्रा में हैं।

भूमिगत जल स्तर: केंचुए भूमि के बन्द छिद्रों को खोलने का कार्य करते हैं (Wang et al. 2010) उनके माध्यम से भूमि की ऊपरी सतह का पानी भूमि में चला जाता है। रेडवर्म भूमि की ऊपरी सतह पर विचरण करता है, यह भूमि में छेद नहीं करता है (Puddephatt 2013) अर्थात भूमि की गहराई में नहीं जाता है। इसके विपरीत देशी केंचुए भूमि के अन्दर 15 फीट से भी ज्यादा गहराई तक जाने में सक्षम हैं। इसका अर्थ है कि देशी केंचुए भूमि में पतली-पतली सुरंगें बनाते हैं जिन में से वर्षाकाल में अतिरिक्त पानी भूमि में चला जाता है और भूमिगत जल स्तर को बनाए रखने में सहायक होते हैं।

जल भराव: केंचुओं द्वारा बनाई गई सुरंगों के माध्यम से भूमि में चला जाता है एवं फसल खड़ी रहती है और किसान का नुकसान नहीं होता है। इंग्लिश रेडवर्म भूमि में नालियाँ/छिद्र नहीं बनाता है जिस कारण वर्षा का पानी फसल में खड़ा रहता है जो फसल को नुकसान करता है। लेकिन देशी केंचुए भूमि में छिद्र करते हैं जिनके माध्यम से खड़ी फसल से पानी भूमि में विसर्जित हो जाता है और फसल बच जाती है।

भूमि की उर्वरा शक्ति: अरीस्टोटल (Aristotle) ने मिट्टी खाने वाले केंचुओं को "पृथ्वी की आंतें" कहा है। क्योंकि इन्हीं मिट्टी खाने वाले केंचुओं द्वारा बनाई गई सुरंगें अन्तड़ीयों की भान्ति जाल बनाती हैं जिससे वायु संचरण के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है (Puddephatt 2013)।

प्रवासन: इंग्लिश रेडवर्म खाने के अभाव में दूसरे स्थान (खेत) पर चला जाता है जबकि देशी केंचुए दूसरे स्थान (खेत) में नहीं जाता बल्कि उसी जगह पर भूमि में गहराई में जाकर समाधी (सो जाता है) ले लेता है।

ह्यूमस का निर्माण: देशी केंचुऐ भूमि में ह्यूमस का निर्माण करते हैं जबकि इंग्लिश रेडवर्म ऐसा नहीं करता बल्कि ह्यूमस के निर्माण को रोकता है।

विभिन्न तापमान पर जीवनकाल: देशी केंचुए 0 से 52 डिग्री ‌‌‌सेल्शियस तापमान में भी भूमि अन्दर नमी में कार्य करते रहते हैं, जबकि इंग्लिश रेडवर्म 28 डिग्री ‌‌‌सेल्शियस से अधिक तापमान पर जीवित नहीं रह पाता।

हानिकारक धातु अवशेष: इंग्लिश रेडवर्म हानिकारक कृषि अवशेषों, गोबर में कैडमियम, आर्सेनिक, पारा, शीशा को भी अवशोषित करते हैं व ये धातुएं पौधों में भी आ जाती हैं। जबकि देशी केंचए इन धातुओं को नहीं लेते हैं।

ऊपर वर्णित बिन्दुओं से ज्ञात होता है कि भूमि की गहराई तक आवगमन करने वाले विभिन्न प्रकार के मिट्टी खाने वाले केंचुओं की पेड़-पौधों की वृद्धि में एवं भूमि को बलवान बनाने में अहम् भूमिका है।

‌‌‌देशी केंचुए भूमि में अन्नत करोड़ छेद करता है। देशी केंचुआ केवल मिट्टी ही खाता है, जो 0-52° C तापमान तक कार्य करता है, इसकी आयु सामान्यावस्था में 15 वर्ष है।

जब यह भूमि में प्रवेश करता है तो मिट्टी, बालू, कच्चा पत्थर व चूना पत्थर खाते-खाते गहराई में जाता है और नीचे से दूसरे छेद से वापस खाते-खाते ऊपर आता है जिस छेद से केंचुआ अन्दर जाता है उसी छेद से ‌‌‌वापस नहीं आता है, बल्कि दूसरा छेद करके वापस ऊपर आता है। फिर नीचे जाने के लिए नया छेद करता है और फिर वापस ऊपर आने के लिए नया छेद बनाकर ही आता है। इस प्रकार 24 घण्टे ऊपर-नीचे जाता-आता रहता है और भूमि में अन्नत छेद करता रहता है। केंचुए की विष्टा में फसल के लिए आवश्यक सूक्ष्म तत्वों का अनन्त भण्डार होता है, जिससे खेत में कम हुए सूक्ष्म तत्वों की निरन्तर पूर्ति होती रहती है। केंचुओं की विष्टा में मिट्टी से 7 गुणा ज्यादा नाट्रोजन होता है, 9 गुणा फास्फेट, 11 गुणा पोटाश, 6 गुणा कैल्शियम, 7 गुणा मैग्निशियम और 10 गुणा ज्यादा गन्धक होता है। इस प्रकार सारे पोषक तत्व कई गुणा अधिक होते हैं। जब केंचुए लगातार कार्य करते रहते हैं तो उनको कार्य करने के लिए एक विशिष्ट परिस्थिति ‘सूक्ष्म पर्यायवरण’ (Micro Climate) की आवश्यकता होती है।

शोधों में 20 से 40 सें.मी. के ड्रिल-क्षेत्र में 40 प्रतिशत वायुवीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण, 13 प्रतिशत अवायवीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण, 16 प्रतिशत अनाइट्रीकरण जीवाणु पाए गये हैं (‌‌‌Kale and Karmegam 2010)। शोध में पाया गया है कि ड्रिल-क्षेत्र में केंचुए ज्यादा पाए जाते हैं तो उनमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणुओं की सक्रियता के कारण कार्बन:नाइट्रोजन का अनुपात कम पाया गया है। इसी प्रकार अन्य शोधों से पता भी चलता है कि केंचुओं से भरपूर ड्रिल-क्षेत्र में कार्बन पदार्थों की मात्रा ज्यादा होती है (Andriuzzi et al. 2016)।

‌‌‌ऊपर-नीचे जाते-आते समय केंचुआ अपने शरीर से एक द्रव्य पदार्थ निकालकर छेदों की दीवारों को लिप देता है ताकि छेद बन्द न हों। उस द्रव्य पदार्थ को वर्मि-वाश (Vermi-wash) कहते हैं। इसके सारे पोषक तत्वों के साथ-साथ कुछ संजीवक (हॉरमोन्स - Hormones) भी होते हैं जो जड़ों के लिए आवश्यक होते हैं। केंचुए नीचे-ऊपर, जाने-आने में हमेशा मिट्टी खाते रहते हैं। ये गहराई का महासागर (जैसे कि कच्ची चट्टान, रेत के कण, चूने की चट्टान) खाते हैं। साथ में भूमि में फसलों में बीमारी पैदा करने वाले राक्षस जन्तुओं को निगल कर उनका नाश भी करते हैं। इसके विपरीत भूमि के अन्दर के उपयुक्त जीवाणुओं को अपने पेट में लेकर उनको सचेतन/ऊर्जावान बनाते हैं और विष्टा के माध्यम से पेड़ों की जड़ों के पास डालते हैं। केंचुओं के शरीर में एक जैव-संयन्त्र होता है, जो खाते है उसको संस्कारित कर विष्टा के माध्यम से पेड़ों की जड़ों के पास डालते हैं।

‌‌‌भारतीय केंचुए – Amynthas morrisi, Dichogaster bolaui, Drawida calebi, Eutyphoeus incommodus, Eutyphoeus nicholsoni, Eutyphoeus waltoni, Glyphidrilus sp., Lampito mauritii, Metaphire posthuma, Octochaetona surensis, Pheretima posthuma, Ramiella bishambari

‌‌‌अधिक जानकारी के लिए ‌‌‌जीरो बजट प्राकृतिक खेती के प्रणेता पद्धमश्री कृषि संत श्री सुभाष पालेकर जी का साहित्य पढ़ें। [Web Reference]

सभार: डा. जगवीर रावत, (सह-प्राध्यापक - पशु चिकित्सा माइक्रोबायोलॉजी विभाग, लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार - 125004, हरियाणा, भारत) के मार्गदर्शन के लिए लेखक आभारी हैं।

संदर्भ 

‌‌‌Andriuzzi W.S., et al., 2016, “Organic matter composition and the protist and nematode communities around anecic earthworm burrows,” Biology and Fertility of Soils; 52(1): 91-100. [Web Reference]

Flack F.M. and Hartenstein R., 1984, “Growth of the earthworm Eisenia foetida on microorganisms and cellulose,” Soil Biology and Biochemistry; 16(5): 491-495. [Web Reference]

Garg V.K., et al., 2005, “Growth and reproduction of Eisenia foetida in various animal wastes during vermicomposting,” Applied Ecology and Environmental Research; 3(2): 51-59. [Web Reference]

Gupta, S. K., and V. Sundararaman. "Correlation between burrowing capability and AChE activity in the earthworm, Pheretima posthuma, on exposure to carbaryl." Bulletin of environmental contamination and toxicology 46.6 (1991): 859-865. [Web Reference]

Kale R.D. and Karmegam N., 2010, “The role of earthworms in tropics with emphasis on Indian ecosystems,” Applied and Environmental Soil Science; [Web Reference].

Langmaack M., et al., 1999, “Quantitative analysis of earthworm burrow systems with respect to biological soil-structure regeneration after soil compaction,” Biology and Fertility of Soils; 28(3): 219-229. [Web Reference]

Nath G., Singh K. and Singh D.K., 2009, “Effect of different combinations of animal dung, and agro/kitchen wastes on growth and development of earthworm Eisenia foetida,” Aust J Basic Appl Sci; 3(4): 3672-3676. [Web Reference]

Puddephatt K.J., 2013, “Determining the sustainability of land-applying biosolids to agricultural lands using environmentally-relevant terrestrial biota,” Diss. Master’s thesis, Ryerson University; p.: 61. [Web Reference]

Wang D-b, et al., 2010, “Effects of earthworms on surface clogging characteristics of intermittent sand filters,” Water Science and Technology; 61(11): 2881-2888. [Web Reference]

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