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रासायनिक कीटनाशक एवं आहार श्रृंखला

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रासायनिक कीटनाशक एवं आहार श्रृंखला

के.एल. दहिया* ‌‌‌एवं वजीर सिंह**

* स्नातक, पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान; ग्लोबल सीटी, कुरूक्षेत्र, हरियाणा – भारत

** ‌‌‌पी.एच.डी. एल.एल.बी.; मकान न. 23, सेक्टर 30, कुरूक्षेत्र, हरियाणा, भारत – 136118; ‌‌‌ई-मेल: wazir2330@gmail.com

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जीवन इस सृष्टि का आधार है और जीवनयापन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। बिना ऊर्जा के कोई ‌‌‌भी जीव जीवित नहीं ‌‌‌रह सकता है। जीव-जन्तुओं को जीवनयापन के लिए ऊर्जा पेड़-पौधों से मिलती है। पेड़-पौधे प्रकाशसंश्लेषण (photosynthesis) की प्रकिया द्वारा कार्बोहाड्रेट्स जैसे भोजन को बनाने के लिए सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करते हैं। इन्ही पेड़-पौधों को शाकाहारी ग्रहण करते हैं। माँस-भक्षी जीव इन शाकाहारीयों को अपना भोजन बनाते हैं। इस प्रकार ऊर्जा ग्रहणीय होकर एक जीव से दूसरे जीव में स्थानान्तरित होती रहती है। ‌‌‌इसको आहार श्रृंखला कहते हैं। ‌‌‌जो चीज जीवित रहने के लिए ग्रहण की जाती है, उसको आहार या भोजन कहते हैं। ‌‌‌इस चित्र में आहार श्रृंखला को दर्शाया गया है।

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आहार श्रृंखला: ‌(अ) - जंगल में; (ब) - घास के मैदान; (स) - तालाब में

आहार श्रृंखला का प्रारम्भिक बिंदु उत्पादक (Producer) होता है। उत्पादक वास्तव में पेड़-पौधे होते हैं जिन पर सारा जीवन-चक्र निर्भर है। इसलिए कहा जा सकता है कि सभी आहार श्रृंखलाओं का आधार पेड़-पौधे (घास) ही होते हैं।

जंगल में हिरण पेड़-पौधे (घास) खाती है और उसी जंगल में शेर हिरण को खा जाता है। इसी प्रकार कीट-पतंगे पौधों को खाकर जीवनयापन करते हैं व इन्ही कीट-पतंगों को मेंढक, मेंढक को सांप व सांप को बाज खाता है। इसी प्रकार पानी में छोटे जीव पौधों को खाते है, व इन जीवों को मछली व मछली को बगुला खाकर आहार श्रृंखला पूर्ण करते हैं। ऊपर दर्शाये गये चित्र से यह भी निकर्ष निकलता है कि इस आहार श्रृंखला में पेड़-पौधे (घास) सर्वोपरी हैं, उन्ही से यह सृष्टि चक्र चलता है। ‌‌‌समुदाय में जीवित जीवों का अनुक्रम जिसमें एक जीव, भोजन (आहार) ऊर्जा स्थानान्तरित करने के लिए दूसरे जीव का उपभोग करता है, आहार श्रृंखला कहलाता है। आसान भाषा में कह सकते हैं कि ‘कौन किसको खाता है’ दर्शाने वाली जीवों (जीवित जीवों) की सूची, आहार श्रृंखला कहलाती है।

क्रमानुसार ‌‌‌उपभोग वाली आहार श्रृंखला को अहिंसात्मक कहते हैं। इस क्रमानुसार आहार श्रृंखला में ऐसा नहीं होता कि हिरण शेर को खाता हो। यदि ऐसा है तो इसे अहिंसात्मक आहार श्रृंखला ‌‌‌नहीं कहा जाएगा। इस क्रमानुसार अहिंसात्मक श्रृंखला में जो जिसका भोजन है, वह उसी का उपभोग करता है।

लेकिन आज हमने इस आहार श्रृंखला को रासायनों के उपयोग से दूषित कर लिया है। इस दूषित आहार श्रृंखला से न केवल हमारे पर्यायवरण में मौजूद जीव-जन्तुओं को नुकसान हुआ है, अपितु मानव भी इससे अछूते नहीं हैं। ‌‌‌कृषि में कीटों के नियन्त्रण के लिए कीटनाशकों उपयोग करते हैं। इससे कीट व अन्य जीव-जन्तु तो मरते ही हैं लेकिन कीटनाशकों का खेतों में छिड़काव करते समय किसान या उसका मजदूर असमय ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है। इतना ही नहीं इन कीटनाशकों के अवशेष फसल के माध्यम से हमारी भी भोजन श्रृंखला में प्रवेश करते हैं जो मनुष्य के साथ-साथ अन्य जीव-जन्तुओं में पहुंचकर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव जैसे कि शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता को कम करना, आयु कम करना, व कैंसर जैसी भयानक बीमारीयाँ उत्पन्न करते हैं।

जिस प्रकार कृषि में कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, किसान कई बार इनको पशुओं के शरीर पर लगी चिचड़ियों के नियन्त्रण के लिए उपयोग करता ‌‌‌है जिसमें बहुधा अमसय ही पशुओं की ‌‌‌जान चली जाती है और इस प्रकार उस किसान के पशुधन की हानि हो जाती है।

कृषि में शत्रु कीटों के नियन्त्रण अथवा उनको मारने के लिए कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है। ये कीटनाशक शत्रु कीटों को मारने के साथ-साथ अन्य मित्र कीटों व जीव-जन्तुओं को भी मारते हैं। कीटनाशकों के अत्याधिक उपयोग से उनमें प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है। इस प्रतिरोध क्षमता के बढ़ने से शत्रु कीट नहीं मरते और संख्या प्रतिकुलात्मक बढ़ती है जिसको फिर नियन्त्रित करने के लिए कीटनाशक बदला जाता है या कीटनाशक की और ज्यादा मात्रा का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार इन शत्रु कीटों में लगातार प्रतिरोध क्षमता बढ़ती जा रही है। इनकी संख्या बढ़ रही है और मित्र कीटों व जीव-जन्तुओं की संख्या कम होती जा रही है। इस प्रकार यह देखने में आता है कि आहार श्रृंखला का संतुलन बिगड़ गया है और किसान शत्रु कीटों को नियन्त्रित करने के चक्कर में धन का अपव्यय कर रहा है। इस अपव्यय से किसान की आर्थिक स्थिती बिगड़ती जा रही है व वह कर्ज के बोझ के नीचे दबता जा रहा है और किसानों में आत्महत्याएं भी रही हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि रासायनयुक्त आहार श्रृंखला से

* जीवन का मूल आधार - पेड़-पौधे-घास, खाद्य पदार्थ आदि जहरयुक्त हो चुके हैं।

* जहरयुक्त खाद्य पदार्थ जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों व मनुष्यों के शरीर में आ चुके हैं।

* जहरयुक्त शरीर बीमारीयों का घर बन चुका है।

* बीमारीयुक्त शरीर असमय ही दम तोड़ रहा है।

क्या ऐसा हो सकता है कि जहरमुक्त आहार श्रृंखला से मुक्ति मिल जाए व जीवन खुशहाल हो जाए। आज की इस जहरयुक्त कृषि में ‘शुन्य लागत प्राकृतिक (आध्यात्मिक) खेती’ में एक उम्मीद की किरण दिखायी देती है। इस पद्धति के अंतर्गत बाजार से खरीदकर खेतों में कुछ भी डालने की आवश्यकता नहीं है या कहें कि नाम-मात्र ही खर्चा होता है और पैदावार ‌‌‌थोड़ी सी कम नही होती और साथ ही यह पद्धति जहरयुक्त आहार श्रृंखला से भी मुक्ति दिलाती है। यह पद्धति नई नहीं है लेकिन इसमें कुछ आयाम अवश्य ही जुड़े हैं। तो आईये अपनी प्राचीन संस्कृति को सम्भालते हुए नये आयाम स्थापित करें और ‘शुन्य लागत प्राकृतिक (आध्यात्मिक) खेती’ करके जहरमुक्त खाद्यान पैदा करें और अपनी संस्कृति को सहेजते हुए आगे बढ़ें।

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