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एक देसी गाय से 30 एकड़ खेती - ‌‌‌भाग 2

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<‌‌‌<--भाग 1

भारतीय उप महाद्विप की मूल गायों की नस्लें: ‌‌‌आलमबादी, अमृतमहल, बचौर, बर्गुर, बलाही, बिन्जलपुरी, डांगी, देवनी, गंगातिरी, गाओलाओ, घुमसरी, गीर, हालीकर, हरियाना, पहाड़ी, कंगायम, कांकरेज, केन्कथा, खैरीयार, खेड़ीगढ़, खिलारी, कोसली, कृष्णा वैली, मालनाड गिद्धा, मालवी, मेवाती, मोटू, नागोरी, निमारी, ‌‌‌ओंगल (ओंगोल), पंवार, पुलिकुल्लम, पुंगानुर, राठी, लाल कंधारी, लाल सिंधी, साहीवाल, सांचोरी, सिरी, थारपारकर, थो-थो, ‌‌‌ट्रिन्केट, उमलाचेरी (अमलाचेरी), वेचुर, ‌‌‌वृन्दावनी इत्यादि ‌‌‌भारत के विभिन्न राज्यों एवं क्षेत्रों में ‌‌‌पाली जाती हैं।

तुलनात्मक ‌‌‌शोधों से ज्ञात होता है कि देशी गाय के एक ग्राम गोबर में 300 करोड़ होते हैं। ये जीवाणु फसल के लिए सहायक होते हैं। भूमि के जीवाणुओं के लिए सबसे अच्छा जामण (Microbial culture) देशी गाय का गोबर ही है। इतने सह-जीवाणु किसी अन्य पशु के गोबर में नहीं होते। एक दिन में एक गाय 5-13 लीटर मूत्र का उत्पादन करती है। ‌‌‌गौ-मूत्र जैव वर्द्धक कार्य करता है।

एक दिन में एक गाय 10-12 किलोग्राम गोबर का उत्पादन करती है। अनुसंधान बताते हैं कि केंचुओं को कार्य पर लगाने के लिए महीने में केवल एक ही बार 10 किलोग्राम गोबर प्रति एकड़ की आवश्यकता है। अद्ययनों से ज्ञात होता है कि प्रति दिन 10 किलोग्राम गोबर देने वाली गाय 30 एकड़ की फसल की जा सकती है व व्यर्थ के खर्च से बचा जा सकता है। इसके लिए गोबर व गौ-मूत्र के उपयोग का पता होना आवश्यक है।

‌‌‌देशी गाय के गोबर व मूत्र को जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत, ‌‌‌सप्त-धान्यांकुर अर्क, नीमास्त्र, ‌‌‌अग्नि-अस्त्र, ‌‌‌ब्रह्मास्त्र, ‌‌‌दशपर्णी अर्क, फफूंदनाशक (फंगीसाइड) व अन्य प्रकार के रूप में कृषि-भूमि में उपयोग कर सकते हैं।

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