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ये हम कहाँ आ गये हैं

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‌‌‌‌‌‌के.एल. दहिया* ‌‌‌एवं वजीर सिंह**

* स्नातक, पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान; ग्लोबल सीटी, कुरूक्षेत्र, हरियाणा – भारत

** ‌‌‌पी.एच.डी. एल.एल.बी.; मकान न. 23, सेक्टर 30, कुरूक्षेत्र, हरियाणा, भारत – 136118; ‌‌‌ई-मेल: wazir2330@gmail.com

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हम कृषि एवं कृषि उत्पादों में काफी आगे आ चुके हैं, लेकिन इसके साथ ही, जाने-अनजाने में एक ऐसे रास्ते पर आ चुके हैं जिस पर हम काफी कुछ पा कर भी बहुत कुछ खोते जा रहे हैं। कृषि उत्पादों की उत्पादन श्रेणी में हम वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्दा में आ चुके हैं और धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हैं। ‌‌‌समय की आवश्यकतानुसार, हमारे वैज्ञानिकों ने खाद्यान-आपूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार की पद्धतियों का उपयोग किया है या कर रहे हैं। इन पद्धतियों से बहुत उत्पादन भी ‌‌‌बढ़ा है। लेकिन इसके साथ ही कई ऐसी समस्याएं भी हमारे सामने आ गई हैं जिनसे न केवल आम जन-मानस परेशान ‌‌‌है अपितु इन समस्याओं के हल के लिए हमारे वैज्ञानिक भी चिंतित हैं व इनका हल निकालने में लगे हैं। ‌‌‌आज हम डायबिटीज के मामले में वैश्विक राजधानी बन गये हैं (Kaveeshwar and Cornwall 2014)। ह्दय रोगों ‌‌‌व अन्य असंक्रामक रोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विकासशील देशों सन 2025 तक कुल मानवीय मौतों का 25 प्रतिशत असंक्रामक रोगों से होने की अशंका व्यक्त की गई है (Pagidipati and Gaziano 2013)। कैंसर के रोग लगातार बढ़ रहे हैं। काफी संख्या में अनुवांशिक बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। तनावयुक्त जीवन तो हम सभी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इन समस्याओं में काफी हद तक आधुनिक जीवनशैली के साथ-साथ आधुनिक कृषि पद्धति का सहयोग भी रहा है। इस कृषि पद्धति में रासायनों विशेषतौर पर कीटनाशकों का सहयोग रहा है। ‌‌‌आज हमें ऐसा लगता है कि इन कीटनाशकों के बिना हम कृषि नहीं कर सकते हैं। कीटनाशकों के इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है (Zhang et al., 2011):

1.    पहले चरण में (1870 से पहले की अवधि) प्राकृतिक कीटनाशकों, उदाहरण के लिए प्राचीन ग्रीस में सल्फर, कीटनाशकों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

2.    दूसरा चरण अकार्बनिक सिंथेटिक कीटनाशकों (Inorganic synthetic pesticides) का युग (अवधि 1870-1945) था। इस अवधि के दौरान प्राकृतिक सामग्री और अकार्बनिक यौगिकों (Inorganic compounds) का मुख्य रूप से उपयोग किया गया था।

3.    तीसरा चरण (1945 से अब तक) जैविक सिंथेटिक कीटनाशकों (organic synthetic pesticides) का युग है।

1945 के बाद से मानव निर्मित जैविक कीटनाशकों, जैसे, डीडीटी (DDT), हेक्साक्लोरोसाइक्लोक्सेन (Hexachlorocyclohexane), और डाईएल्डि्रन (Dialderin) जैसे कीटनाशकों ने अकार्बनिक और प्राकृतिक कीटनाशकों के युग को समाप्त कर दिया है। तब से तब से लेकर अब तक बहुत से कीटनाशकों को मनुष्यों द्वारा संश्लेषित (Synthesize) किया गया है, और उन्हें रासायनिक कीटनाशकों का नाम दिया गया है। रासायनिक कीटनाशकों के अनुप्रयोग, विशेष रूप से कार्बनिक संश्लेषित कीटनाशक, मानव सभ्यता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है, जो कृषि उत्पादकता को काफी सुरक्षा और सुविधा प्रदान कर रहा है। ‌‌‌इन रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग ने कृषि उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की है, जिससे फसल संरक्षण और उपज में वृद्धि हुई है। हालांकि, पर्यावरण के विभिन्न हिस्सों में कीटनाशक अवशेषों की खोज ने उनके उपयोग के संबंध में गंभीर ‌‌‌समस्याओं को ‌‌‌प्रदर्शित किया है (Ali et al. 2015, Sharma et al. 2014)। ‌‌‌कीटनाशक कृषि में कीटों और वेक्टरजन्य बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए दुनिया भर में व्यापक उपयोग में हैं (Abhilash and Singh, 2009; Zhang et al., 2011)। शोधों से यह ज्ञात होता है कि रासायनिक कीटनाशकों के लगातार उत्पादन, वितरण एवं उपयोग में अग्रणी योगदानकर्ताओं में से ‌‌‌भारत प्रमुख देश है (Yadav et al. 2015) ‌‌‌और इन सब का मानवीय स्वास्थ्य पर ‌‌‌बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है।

‌‌‌कैंसर रोगियों की बढ़ती संख्या: पंजाब के मालवा क्षेत्र को अब 'कैंसर बेल्ट' और ‘बठिंडा-बीकानेर ट्रेन’ के रूप में जाना जाता है जो पंजाब से कैंसर के रोगियों को बीकानेर (राजस्थान) में आचार्य तुलसी क्षेत्रीय कैंसर उपचार और अनुसंधान संस्थान के रूप में ‘कैंसर एक्सप्रेस’ या ‘कैंसर ट्रेन’ के रूप में ‌‌‌प्रदर्शित करता है (Kaur and Sinha 2013)। पंजाब में उपयोग होने वाली कुल कीटनाशक दवाईयों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा ‌‌‌इसी क्षेत्र में हुआ है। केरल के कासरगोड जिला में भारी संख्या में कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ी है (Kumar et al. 2012)। वैज्ञानिकों के अनुसार कैंसर के रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो भविष्य में एक विकराल रूप धारण कर सकती है।

‌‌‌पशु उत्पादों में बढ़ता जहर: ‌‌‌पशु उत्पादों में हुए शोधों से ज्ञात हुआ है कि मनुष्य ही नहीं वरन् पशु भी रासायनों से अछूते नहीं हैं। पशु जन्य उत्पाद खासतौर पर हर मनुष्य द्वारा दैनिक आहार हिस्सा दूध भी इससे अछूता नहीं है (‌‌‌भास्कर 2017)। इन शोधों से यह भी ज्ञात होता है कि मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं में इन रासायनों से बीमारीयाँ बढ़ रही हैं। कीटनाशक मिले दूध के लगातार सेवन से कई प्रकार की बीमारीयाँ होती हैं, जिनमें मुख्य रूप से कैंसर, गुर्दे, जीगर, हृदय, उच्च रक्तचाप, उदर रोग और आँखों के रोग होते हैं। पशुओं और मनुष्य में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। इन बीमारीयों के कारण औसत आयु कम हो जाती है। खेती में अन्धाधुन्ध रासायनों के उपयोग से बहुत से पक्षी जैसे कि घरेलू चिड़ीया, कौवे, गिद्धों की संख्या में भारी कमी आई है।

विभिन्न प्रकार की विकलांगताएं: केरल प्लांटेशन कॉरपोरेशन ने 1978 में केरल रज्य के कासारगोड जिले में 45,000 हेक्टेयर में फैली काजू का पेड़ों पर एन्डोसल्फान, एक अत्यधिक जहरीले ऑर्गेनोक्लोरीन कीटनाशक का छिड़काव ‌‌‌हवाई स्प्रे शुरू कर किया। 1981 में स्वतन्त्र पर्यावरण पत्रकार श्रीपादर ने घरेलू जानवरों में विभिन्न विकलांगताओं पर रिपोर्ट तैयार करके बड़े पैमाने पर एन्डोसल्फान के उपयोग करने के परिणाम बताए (Irshad and Joseph 2015)। कासरगोड जिले के कुछ गांवों में वयस्कों और बच्चों के बीच कई विकृतियों में विकलांगता राष्ट्रीय औसत से अधिक थी। ‌‌‌1985 से कुछ गाँवों में एन्डोसल्फान ‌‌‌का सार्वजनिक प्रतिरोध बढ़ने लगा और अन्तत्य: एन्डोसल्फान के उपयोग की बात हुई। 1998 में केरल सरकार ने इसके उपयोग पर अस्थायी प्रतिबन्ध लगाया और ‌‌‌20 वर्ष उपयोग के बाद ‌‌‌सन 2001 में पूर्णत: प्रतिबन्ध लगा दिया। दुर्भाग्यपूर्ण आज तक भी पीढ़ितों को ‘कीटनाशक पीढ़ित’ नहीं माना गया है।

‌‌‌कृषि में कीटनाशकों एवं रासायनों के अत्याधिक उपयोग से कृषि उत्पादन लागत बढ़ने के साथ ही किसान को उसका न्यूनत्तम समर्थन मूल्य न मिलने के कारण उसको लाभ नहीं हो रहा है। इसलिए खेती करना केवल एक मजबूरी बन गया है। लाभ न होने के कारण आज किसान व उसका परिवार आज के आधुनिक दौर में समाज से साम्जस्य नहीं बना पा रहा है और इस कारण उसके साथ-साथ उसका परिवार और उसके मजदूर भी परेशान हैं। वह चिन्ताग्रसित रहने से जीवनशैली युक्त ह्रदय रोग और डायबिटीज जैसी खतरनाक बीमारीयों से भी ग्रसित होने लगा है।

‌‌‌इस प्रकार यह देखने में आता है कि कृषि उत्पादन तो बढ़ा है, साथ ही कृषि लागत भी बहुत बढ़ी है लेकिन उत्पादन मूल्य सही न मिलने के कारण आमदनी नहीं बढ़ी जिससे किसान की हालत ‘आमदनी अट्ठनी खर्चा रूपया’ जैसी हो ‌‌‌चुकी है। यदि वह या उसका परिवार या मजदूर बीमार हो जाए तो उसके पास इतना भी धन नहीं होता कि ईलाज करवा सके और अन्तय: अकाल ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है।

‌‌‌इसलिए यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि ‘ये हम कहाँ आ गये हैं’ । हमने गम्भीर-से-गम्भीर बीमारी पर विजय पाकर भी हमने नहीं बीमारीयों को पैदा कर लिया है। अत: हमें यह समझना ही पड़ेगा कि इन घातक समस्याओं से छुटकारा कैसे पाएं।

‌‌‌हर मंच पर दोहराया जाता है कि पहले मानव सुखी थी, स्वस्थ था लेकिन आज स्वस्थ नहीं है। हमारे विकास के साथ-साथ सबसे ज्यादा विकास हमारे अन्दर विकसित होने वाली बीमारीयों ने ही किया है। यदि हमें उपज ‌‌‌का सही मूल्य नहीं मिलता है तो कम-से-कम उपज का उत्पादन तो कम करना ही चाहिए। यह सम्भव है भारत में पद्धमश्री सुभाष पालेकर जी द्वारा विकसित एवं ‌‌‌प्रचारित ‘जीरो बजट कुदरती (‌‌‌अध्यात्मिक) खेती’ ‌‌‌के द्वारा। इस पद्धति में कृषि उत्पाद रासायानिक खेती से भी ज्यादा लाभ दे सकते हैं। इससे कृषि जन्य बीमारीयों पर अंकुश लगने के साथ-साथ रोगों से भी छुटकारा मिलता है जिससे शरीर निरोगी और खुशहाल होगा।

भयावह परिस्थितियां समझने के बाद तो जीवन को खुशहाल बनाने के कार्य में आहुति डालने का कार्य करना चाहिए। ‌‌‌तो आओ आज से ही ये अच्छा कर्म करने की शुरूआत करें। ‌‌‌न जहर को खांएगे और न ही परोसेंगे।

‌‌‌संदर्भ

Abhilash P.C. and Singh N., 2009, “Pesticide use and application: an Indian scenario,” Journal of hazardous materials; 165(1): 1-12. [Web Reference]

Ali U., et al., 2014, “Organochlorine pesticides in South Asian Region: A review,” Science of The Total Environment; 476: 705-717. [Web Reference]

Augustine A., 2016, “Community-Based Rehabilitation for Children with Intellectual Disability: A Case Study of Endosulfan Affected Areas in India,” Disability, CBR & Inclusive Development; 27(3): 132-140. [Web Reference]

Irshad S.M. and Joseph J., 2015, “An Invisible Disaster,” Economic & Political Weekly; 50(11): 61-65. [Web Reference]

Kaur R. and Sinha A.K., 2013, “Green Revolution and Its Impact on Health: An Analysis." Global Warming, Human Factors and Environment: Anthropological Perspectives; Excel India Publishers New Delhi; p. 264-273. [Web Reference]

Kaveeshwar S.A. and Cornwall J., 2014, “The current state of diabetes mellitus in India,” The Australasian medical journal; 7(1): 45-48. [Web Reference]

Kumar B., et al., 2012, “A descriptive analysis of cancer cases from Endosulfan affected areas of Kasaragod district, Kerala,” Health Sciences; 2(4): 7-8. [Web Reference]

Sharma B.M., et al., 2014, “Environment and human exposure to persistent organic pollutants (POPs) in India: A systematic review of recent and historical data,” Environment international; 66: 48-64. [Web Reference]

WHO, 2011, “Global Status Report on Non-communicable Diseases 2010,” Published by World Health Organization, 2011, p. 34. [Web Reference]

Yadav I.C., et al., 2015, “Current status of persistent organic pesticides residues in air, water, and soil, and their possible effect on neighboring countries: a comprehensive review of India,” Science of the Total Environment; 511: 123-137. [Web Reference]

Zhang W., Jiang F. and Ou J., 2011, “Global pesticide consumption and pollution: with China as a focus,” Proceedings of the International Academy of Ecology and Environmental Sciences; 1(2): 125-144. [Web Reference]

‌‌‌भास्कर, 2017, “7 जिलों से लिए दूध के 104 में से 84 सैंपल फेल, मिला कीटनाशक,” हरियाणा, दैनिक भास्कर, पानीपत, गुरूवार 11 मई 2017, पेज सं. 2. [Web Reference]

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