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सिफारिशें - ज़हर-मुक्त खेती - सूक्ष्म पर्यावरण

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‌‌‌पर्यायवरण का अर्थ उस उस परिवेश से होता है जो जीवमण्डल को चारों ओर से घेरे हुए है। इसके अर्न्तगत वायुमण्डल, स्थलमण्डल, जलमण्डल के भौतिक, रासायनिक एवं सभी तत्त्वों को सम्मिलित किया जाता है। प्रकृति के दो तत्त्व वंशानुक्रम एवं पर्यायवरणजीवों एवं उनकी क्रियाओं को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। इसलिए पर्यायवरण को समझने के लिए वायुमण्डल, स्थलमण्डल, जलमण्डल एवं जीवमण्डल को समझना आवश्यक हो जाता है। किसी जीव या उसके अजैविक एवं जैविक परिवेश के बीच अन्तर्क्रिया केवल ‌‌‌परिवेश या सूक्ष्म पर्यायवरण को ही नहीं वन्यजीवों के क्रियाकलापों को भी प्रस्तुत करती है।

‌‌‌पर्यायवरण में ही दोनों तत्त्व जैविक और अजैविक पाए जाते हैं। जैविक तत्त्वों में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु और मानव आते हैं, जबकि अजैविक तत्त्वों में वायु, जल, भूमि, मिट्टी, वन आदि तत्त्व आते हैं। जैविक तथा अजैविक तत्त्व दोनों साथ-साथ क्रियाशील रहते हैं। ये आपस में निर्भर ‌‌‌रहकर जीवन का संचार करते हैं। पर्यायवरण के अर्न्तगत सभी प्राणी, मानव के साथ एक ही भौगोलिक परिवेश में बराबर का हिस्सा बँटाते हैं, परन्तु इसमें मानव अपनी सर्वोपरि व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

ß (विषय-सूचि पर जाएं)

गेहूँ की खेती; धान की खेती; सब्जियों की खेती; कपास ‌‌‌एवं ‌‌‌सब्जियों की खेती; गन्ने की खेती; आलू एवं सरसों की ‌‌‌खेती; अरहर, हल्दी ‌‌‌एवं मिर्च की खेती; पंचस्तरीय बागवानी; जीवामृत; घनजीवामृत; बीजामृत; सप्त-धान्यांकुर; नीमास्त्र; अग्नि-अस्त्र; ब्रह्मास्त्र; दशपर्णी अर्क; फफूंदनाशक (फंगीसाइड); आच्छादन; ‌‌‌जीवनद्रव्य, ह्यूमस; वाफसा और वृक्षाकार प्रबन्धन; सूक्ष्म पर्यावरण; पद्मश्री सुभाष पालेकर जी; अन्तिम पृष्ठ

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