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सिफारिशें - ज़हर-मुक्त खेती - वाफसा और वृक्षाकार प्रबन्धन

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‌‌‌‌‌‌वाफसा (Wafasa) अथवा वापसा (Wapasa) शब्द शुन्य लागत प्राकृतिक खेती के जनक श्री सुभाष पालेकर द्वारा उपयोग किया है जिसका अर्थ है कि पेड़-पौधों की जड़ों में हवा और पानी दोनों होते है जिनको जड़ें ग्रहण करती हैं। ‌‌‌इसका अर्थ है कि जड़ों के पास इतनी ही मात्रा में हवा और पानी चाहिए जिससे कि जड़ों के पास पानी नहीं खड़ा होना चाहिए अथवा जड़ें पानी में नहीं डूबनी चाहिए। श्री सुभाष पालेकर का मानना है कि वस्तव में जड़ें पानी को छूती भी नहीं हैं; जड़ों को पानी नहीं चाहिए बल्कि हवा और पानी का मिश्रण चाहिए, जिसे वाफसा कहा जाता है। भूमि के अन्दर दो मिट्टी कणों के बीच जो खाली जगह होती है, उसमें 50% पानी रूपी वाष्प और 50% हवा का सम्मिश्रण होता है, जो जड़ों द्वारा ग्रहण किया जाता है। जड़ों के पास दो मिट्टी कण समूहों के बीच की खाली जगहों में पूरी तरह से पानी भर देने से उस जगह की हवा ऊपर निकल जाती है। इससे जड़ों एवं जीवाणुओं को प्राण वायु नहीं मिलती और वे मर जाते हैं। फसल भी पीली पड़ जाता और सूख जाती है। इसलिए पानी उतना ही देना चाहिए जिससे जड़ों के पास खाली जगहों में सिर्फ वाफसा रहे, पानी नहीं भरे।

‌‌‌वृक्ष चंदवा / वितान / घेरा (Tree Canopy): ‌‌‌वृक्ष चंदवा भूमि का वह अनुपातीय भाग है जो किसी एक पेड़-पौधे के मुकुट (Crown) की ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण (Vertical projection) द्वारा भूमि की सतह पर बनता है। मुकुट पेड़ या पौधे का वह ‌‌‌भाग है जो पेड़ या पौधों के पत्तों, शाखाओं सहित ऊपर के भू-भाग के आधार पर जिनकी छाया भूमि पर बनती है। साधारण शब्दों में इसको इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है किसी भी पेड़-पौधे का वह अनुपातीय भाग जहाँ पर दोपहर को पौधे की छाया भूमि पर बनती है, उसे पेड़-पौधों का चंदवा कहा जाता है। दोपहर ‌‌‌12 बजे ‌‌‌(या ‌‌‌दिन के समय सबसे छोटी छाया) भूमि पर ‌‌‌पेड़ या पौधे के मुकुट द्वारा बनने वाली छाया मानव द्वारा उगाये जाने पेड़-पौधों की पोषणता को भी परिभाषित करती है। इसी छाया की अंतिम सीमा पर वाफसा लेने वाली जड़ें होती है। छाया के अन्दर वाफसा लेने वाली जड़ें नहीं होती। ‌

यह एक सामान्य धारणा है कि बाहरी तौर पर दिखने वाला पेड़ का चंदवा भूमिगत जड़ों के चंदवे का प्रतिबिंब है। वास्तव में एक पेड़ की जड़ें सामान्य रूप से चंदवे से भी आगे बढ़ जाती हैं। ‌‌‌यद्धपि, पेड़ की स्थिरक जड़ें (anchoring roots) भूमि में गहराई तक जाती हैं, फिर भी ज्यादातर जड़ें भूमि के 12 से 18 ईंच तक की गहराई में ही रहती हैं। ‌‌‌स्थिरक पेड़ों को घेरे के बाहर कम से कम 6 ईंच की दूरी पर नाली के माध्यम से ही पानी चाहिए। इस नाली में इतना ही पानी दिया जाना चाहिए कि जिससे 10 ईंच की गहराई तक ही मिट्टी ही गीली हो जाए। ‌‌‌पेड़ की ‌‌‌जड़ों को गलने या सड़ने से बचाने के लिए सीधे उसके तने के पास पानी नहीं देचा चाहिए, बल्कि उसके पास से मिट्टी से ऊँचा कर देना चाहिए।

तेज धूप या दोपहर (10 बजे से 6 बजे तक) के ‌‌‌समय यदि संभव हो तो, पौधों को पानी नहीं दें। क्योंकि इस समय ‌‌‌वाष्पीकरण से पानी वाष्प बन कर उड़ जाता है। इसलिए पानी के संरक्षण के लिए, शाम के समय ही पौधों का पानी देना हितकारी होगा।

‌‌‌वाफसा निर्माण: ‌‌‌भारत में शुन्य लागत प्राकृतिक खेती के जनक श्री ‌‌‌सुभाष पालेकर जी के अनुसार ‌‌‌भी जब पानी छाया के अन्दर भरता है (बारिश/सिंचाई से) तब वाफसा (Moisture in roots) का निर्माण नहीं होता बल्कि जड़ें सड़ती हैं। पेड़-पौधों को मरने या सड़ने से बचाने के लिए छाया की सीमा से तने तक मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिससे पानी ‌‌‌उनकी जड़ों में ‌‌‌इक्कट्ठा न हो। ‌‌‌श्री पालेकर जी के अनुसार वाफसा बनाने के लिए दोपहर को भूमि पर बनी छाया के 6 ईंच के बाहर आवश्यकतानुसार पानी देने से ही वाफसा का सही निर्माण होता है। ‌‌‌इसके लिए छाया से 6 ईंच की दूरी पर पानी देने के लिए नाली बनानी चाहिए।

 

ß (विषय-सूचि पर जाएं)

गेहूँ की खेती; धान की खेती; सब्जियों की खेती; कपास ‌‌‌एवं ‌‌‌सब्जियों की खेती; गन्ने की खेती; आलू एवं सरसों की ‌‌‌खेती; अरहर, हल्दी ‌‌‌एवं मिर्च की खेती; पंचस्तरीय बागवानी; जीवामृत; घनजीवामृत; बीजामृत; सप्त-धान्यांकुर; नीमास्त्र; अग्नि-अस्त्र; ब्रह्मास्त्र; दशपर्णी अर्क; फफूंदनाशक (फंगीसाइड); आच्छादन; ‌‌‌जीवनद्रव्य, ह्यूमस; वाफसा और वृक्षाकार प्रबन्धन; सूक्ष्म पर्यावरण; पद्मश्री सुभाष पालेकर जी; अन्तिम पृष्ठ

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