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सिफारिशें - ज़हर-मुक्त खेती - आच्छादन

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आच्छादन या मल्चिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें भूमि की ऊपरी सतह को पौधों के अवशेषों, जैसे कि पत्ते, घास, टहनियाँ, फसल के अवशेष आदि सामग्री, से ढक दिया जाता है ताकि भूमि की सजीवता और उर्वरा शक्ति  सुरक्षित और सरंक्षित रहे। देशी भूमि की संजीवता और उर्वरा शक्ति बढ़ाने में देशी केंचुओं और जीवाणुओं की मुख्य भूमिका होती है। आच्छादन भूमि के अन्दर व बाहर एक सूक्ष्म पर्यायवरण / विशिष्ट पारिस्थिति उत्पन्न करता है जिसमें केंचओं और सूक्ष्म जीवाणुओं की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं। यदि सूक्ष्म पर्यायवरण / विशिष्ट पारिस्थिति उपलब्द्ध नहीं होता तो ये (केंचुए और जीवाणु) कार्य नहीं करते हैं। आच्छादन प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे कि लू/शीत लहर, तेजी से आने वाली बारिश, तेजी से चलने वाली हवा और अन्य बाह्य शत्रु इत्यादि से सूक्ष्म जीवाणुओं और ह्यूमस को सुरक्षित रखने में सहायता करता है।

खेतों में खरपतवार का महत्त्व: खरपतवार भूमाता का दर्पण है। खरपतवार भूमि का दर्पण हैं। जिस वर्ष भूमि के ऊपरी मिट्टी में जिन पोषक तत्वों की कमी होती है, वह पोषक तत्त्व जिस खरपतवार में ज्यादा मात्रा में होता है, उस वर्ष उसी खरपतवार की वृद्धि तेजी से होती है। आयु समाप्ति पर यह खरपतवार विघटित होकर मिट्टी में मिलता है और इस प्रकार संतुलन स्थापित होता है। खरपतवार के पौधों पर मित्र-कीट निवास करते हैं, जो नुकसान करने वाले कीटों का नाश करते हैं। खरपतवार के फूलों पर मधुमख्खियों के आने के कारण परागन (Pollination) होता है, जिससे फूलों का निषेचन होता है और और ऊपज बढ़ती है। इस प्रकार खरपतवार बागवानी एवं गन्ने में हितकारक सिद्ध होता है, अत: उसका विनाश नहीं करना चाहिए। उसे काटकर मुख्य फसल से छोटा कर दें। फसल उत्पाद करने के लिए केवल खरपतवार एवं मुख्य फसल के पत्तों के बीच की सौर ऊर्जा लेने के प्रतिद्वंदिता को ही रोकना है न कि खरपतवारों को नष्ट करना।

जुताई और केंचए: मौसमी फसलों के लिए जुताई आवश्यक है। गहरी जुताई न करें। जुताई इस प्रकार करें कि ऊपर की 4.5 ईंच मिट्टी धीरे से ऊपर आये और धीरे से नीचे बैठे। ये काम पारम्पारिक लकड़ी का हल, बख्खर और ट्रैक्टर से चलने वाले रोटावेटर एवं कल्टीवेटर से किया जा सकता है। खेतों की गहरी जुताई, केंचुएं और जड़ें कराती हैं। देशी केंचुए भूमि में अनन्त छेद करते हैं। मुख्य व सह-फसलों एवं खरपतवार की जड़ों का भूमि के अन्दर बहुत ही गहरा घना जाल तैयार होता है। यदि गहरी जुताई न की जाए तो ये जड़ें गल जाती हैं जिससे भूमि में अनगिनत छेद एवं नालियाँ तैयार होती हैं। केंचुओं के अलावा भूमि के अन्य जीव-जन्तु (जैसे कि चींटी इत्यादि) भी प्राकृतिक तौर पर जुताई करते रहते हैं।

आच्छादन की उपयोगिता

आच्छादन भूमि कटाव को रोकता है।

मिट्टी की संरचना को बनाए रखता है।

वाष्पीकरण को कम करता है जिससे मिट्टी की नमी बनी रहती है।

जैविक आच्छादन (काष्ठाच्दादन) मिट्टी के जीवों के लिए एक उत्कृष्ट भोजन है और उनके विकास के लिए उपयुक्त स्थिति प्रदान करता है।

खर-पतवार को बढ़ने नहीं देता।

भमि का अधिक तापमान नहीं होने देता।

विघटित होने पर पेड़-पौधों को पोषक-तत्त्व प्रदान करता है।

भूमि में कार्बनिक पदार्थ (Organic matter) को बढ़ाता है।

‌‌‌आच्छादन सामग्री के स्रोत: खर-पतवार, फसल के अवशेष, घास, पेड़ों से छंटनी किये गये अवशेष और कृषि प्रसंस्करण या वानिकी अपशिष्ट या अवशेष। आच्छादन तीन प्रकार का होता है।

1. मृदाच्छादन (Soil mulching): मिट्टी का आच्छादन - भूमि की जुताई

2. काष्टाच्छादन (Straw or organic mulching): वनस्पतियों के सूखे अवशेष

3. सजीवाच्छादन (Live mulching - Symbiotic intercrops and mixed crops): अंतरवर्तीय फसलें और मिश्रित फसलें

‌‌‌‌‌‌मृदाच्छादन: मृदाच्छादन का अर्थ है भूमि की कम गहरी (4.5 ईंच) जुताई। कड़ी धूप या अत्यन्त ठण्ड से भूमि का प्रसारण एवं संकुचन होता है जिस से भूमि में दरारें पड़ती हैं। इन दरारों में से भूमि की नमी वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा हवा में चली जाती है। इससे भूमि की आर्द्रता तेजी से कम हो कर जीवाणु एवं जड़ों के जीवन के जीवन व्यापार के लिए आवश्यक नमी उपलब्द्ध न होने से पत्ते पीले हो कर सूखने लगते हैं। इस नुकसान को कम / समाप्त करने के लिए जुताई से भूमि की सतह पर मिट्टी का आच्छादन करते हैं। इससे नमी सुरक्षित रहती है और पेड़-पौधों को उलब्द्ध होती रहती है। मृदाच्छादन के तीन उद्येश्य होते हैं:

1. भूमि में हवा का संचारण करना जिससे जीव-जन्तुओं एवं जड़ों को प्राणवायु मिल सके।

2. बारिश का सम्पूर्ण पानी भूमि में संग्रहित करना, जिससे जीव-जन्तुओं एवं जड़ों को पानी मिल सके।

3. खरपतवार का नियन्त्रण करना।

काष्टाच्छादन: वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि काष्ठाच्छादन भूमि में नाईट्रोजन, फास्फोरस, पोटाशियम और जैविक पदार्थ को बढ़ाते हैं जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है। धान की भूसी, धान की पराली, गन्ने के सूखे पत्ते (पात्ती), सूखी घास, जंगल के पेड़-पौधों के सूखे पत्ते को काष्ठाच्छादन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। काष्टाच्छादन सबसे अच्छा खरपतवार नाशक का कार्य करता है।

खरपतवारों के बीजों को अंकुरित होने के लिए सूर्य की रोशनी व मिट्टी की आवश्यकता होती है। काष्टाच्छादन मिट्टी में मौजूद खरपतवारों के बीजों को सूर्य की रोशनी में अवरोधक कार्य करते हैं व हवा से प्रसारित होने वाले खरपतावारों के बीजों को मिट्टी के सम्पर्क में आने से रोकते हैं और इस प्रकार सूर्य की रोशनी और मिट्टी के सम्पर्क के अभाव में खरपतावरों के अंकुर मर जाते हैं।

जुताई से भूमि की सतह पर आए ह्यूमस के कण हवा के साथ उड़ कर दूसरी जगह चले जाते हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास होता है। इसी तरह वर्षा के समय भी ये ह्यूमस के कण पानी के साथ बह कर दूसरी जगह चले जाते हैं और भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। इस मृदा अपरदन (Soil erosion) के कारण उर्वरा शक्ति के ह्रास को भी काष्ठाच्छादन सुरक्षित रखता है।

जुताई के कारण भूमि की ऊपरी सतह पर आया ह्यूमस आच्छादन के अभाव में तेज धूप में ऑक्सीजन के सम्पर्क में आने से कर्बाम्ल गैस (CO2) बन कर पर्यायवरण में उड़ जाता है। इससे वैश्विक तापमान वृद्धि (Global warming) की भी समस्या बढ़ती है। काष्ठाच्छादन ह्यूमस को तेज धूप से बचाव कर भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में सहायता करता है।

ह्यूमस (Humus) भूमि में वह कार्बनिक पदार्थ (Soil organic matter) जो पौधों के जीवन के लिए आवश्यक है। ह्यूमस का निर्माण सूक्ष्मजीवों द्वारा पौधों के विघटन से होता है। मिश्रित एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री फसलों के अवशेषों को भूमि की सतह पर आच्छादित करने से ह्यूमस का बहुत अच्छा निर्माण होता है। अकाल के समय विघटित आच्छादन (Decomposed straw mulch) हवा से नमी लेकर पौधों को सुरक्षित रखता है।

आच्छादन के लिए एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री सह-फसलों के अवशेष उपयोग में लाये जाते हैं। किसानों के लिए आवश्यक आच्छादन मुख्य फसल में ही अंतर-फसल के रूप में उपलब्द्ध कराना है।

काष्ठाच्छादन विघटित होने पर खड़ी फसल की जड़ों को पोषक तत्त्व प्रदान करते हैं। काष्ठाच्छादन और जीवामृत मिलकर भूमि में ह्यूमस का निर्माण करते हैं। ह्यूमस जड़ों का खाद्य भण्डार होता है। जड़ें ह्यूमस में से पोषक तत्व लेती हैं जो पौधों में संग्रहित होते हैं।

मन्दिर में नारियल के छिलके और फूल-मालाओं के अवशेषों का उपयोग भी कर सकते हैं। कृषि उपज मण्डियों से फलों/ सब्जियों के अवशेष लेकर भी आच्छादन के लिए उपयोग किये जा सकते हैं।

‌‌‌सजीवाच्छादन (Live mulching): सजीवाच्छादन का अर्थ है मुख्य फसलों के साथ ली गई सह-फसल। सजीवाच्छादन पर किये गये शोध बताते हैं कि यह भूमि की नमी को सुरक्षित रखता है, भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ा कर उत्पादन एवं लाभांश को बढ़ाता है। इसके लिए आवश्यक है कि सह-फसलों का चयन सही होना चाहिए जो इस प्रकार किया जा सकता है:

1. यदि मुख्य फसल एकबीजपत्री है तो सह-फसल द्विबीजपत्री होनी चाहिए और यदि मुख्य फसल एकबीजपत्री है तो सह-फसल एकबीजपत्री होनी चाहिए।

2. यदि मुख्य फसलों की जड़ें गहराई में जाने वाली हों तो सह-फसलों की जड़ें ऊपर सतह पर बढ़ने वाली होनी चाहिए या फिर इसका विपरीत।

3. सह-फसलों की आयु मुख्य फसल की आयु की एक-तिहाई या आधी होनी चाहिए। जैसे कि फसल अगर 180 दिन की है तो सह-फसल की आयु 60-90 दिन होनी चाहिए।

4. सह-फसलों के पौधे की ऊँचाई ऐसे हो कि उनकी छाया मुख्य फसलों के पत्तों पर न पड़े जिससे उनसे सूर्य की रोशनी लेने की प्रतिस्पर्धा न हो।

5. सह-फसलें तेज गति से बढ़ने वाली एवं भूमि को ढकने वाली होनी चाहिए।

6. यदि मुख्य फसल के पत्तों को सूर्य के प्रकाश की पूरी प्रखरता सहन होती है तो सह फसलें ऐसी होनी चाहिए जिनको कड़ी धूप नहीं चाहिए, धूप-छाँव चाहिए।

7. यदि मुख्य फसल तेज गति से बढ़ने वाली हो तो सह-फसल धीमी गति से बढ़ने वाली होनी चाहिए।

8. यदि मुख्य फसल ऐसी है कि जिसके पत्ते नही झड़ते/गिरते हों तो सह-फसल पत्ते गिरने वाली होनी चाहिए।

 

ß (विषय-सूचि पर जाएं)

गेहूँ की खेती; धान की खेती; सब्जियों की खेती; कपास ‌‌‌एवं ‌‌‌सब्जियों की खेती; गन्ने की खेती; आलू एवं सरसों की ‌‌‌खेती; अरहर, हल्दी ‌‌‌एवं मिर्च की खेती; पंचस्तरीय बागवानी; जीवामृत; घनजीवामृत; बीजामृत; सप्त-धान्यांकुर; नीमास्त्र; अग्नि-अस्त्र; ब्रह्मास्त्र; दशपर्णी अर्क; फफूंदनाशक (फंगीसाइड); आच्छादन; ‌‌‌जीवनद्रव्य, ह्यूमस; वाफसा और वृक्षाकार प्रबन्धन; सूक्ष्म पर्यावरण; पद्मश्री सुभाष पालेकर जी; अन्तिम पृष्ठ

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