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सिफारिशें - ज़हर-मुक्त खेती - पंचस्तरीय बागवानी

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‌‌‌जिस भूमि में बागवानी करनी है उस खेत में पूर्व फसल दलहन की लें। पूर्व फसल की कटाई करने के बाद उसके अवशेष एकत्रित करके आच्छादन हेतु उपयोग ‌‌‌में लाने के लिए एक कोने में ढेर लगा दें। ‌‌‌अब खेत की जुताई करें। अंतिम जुताई के पहले प्रति एकड़ 400 किलोग्राम घन-जीवामृत समान रूप से छिड़के और अंतिम जुताई से उसे मिट्टी में मिला दें। वर्षा का पानी आने या सिंचाई के बाद ‌‌‌अंकुरित होकर ऊपर आने वाले खरपतवार को फिर एक बार जुताई से मिट्टी में मिला दें।

‌‌‌तैयार की हुई कृषि भूमि पर 4.5 फुट ‌‌‌चौड़े पट्टे ‌‌‌बनाएं। हर दो पट्टों के बीच में 3.0‌‌‌ फुट ‌‌‌चौड़ी व 1.5 फुट गहरी नालियाँ बनाई जाती हैं। ‌‌‌नाली बनाने के लिए 4.5-4.5 फुट के पट्टों में 1.5-1.5 फुट जगह लेनी होती है। ‌‌‌पट्टा संख्या 1 और 2; 3 और 4; 5 और 6; 7 और 8 के बीच में नालियाँ बनानी होती हैं। ‌‌‌नालियाँ बनाने के बाद हर पट्टे की चौड़ाई 3 फुट बचेगी। हर दो नालियों के बीच में दो पट्टों के लिए छ: फुट जगह पेड़-पौधे लगाने के लिए बचती है। ‌‌‌इस प्रकार 36 फुट चौड़ाई वाले कृषि भूमि में 3-3 फुट की चार नालियाँ, 3-3 फुट के दो पट्टे (‌‌‌पट्टा संख्या 1 व 8) व 6-6 फुट के तीन पट्टे (‌‌‌पट्टा संख्या 2 व 3; 4 व 5; 6 व 7) बनाए जाते हैं। चित्रांकितानुसार इस 36 x 36 फुट की वर्गाकार भूमि पर पेड़-पौधे लगाए जाते हैं।

1. ‌‌‌चित्रांकितानुसार, ‌‌‌गोलाकार (⃝) आकृति (जो 36 x 36 फुट के अन्तर पर है) की जगह पर देशी आम, इमली, चीकू, नारियल, कटहल, काजू इत्यादि बड़े वृक्ष लगाएं। जिस स्थान पर पौधा प्रत्यारोपण करना है, उस जगह पर ‌‌‌खड्डा बनाकर मिट्टी को एक जगह एकत्रित करें। खड्डे को धूप में सूखने दें। खड्डे से निकाली गई कुल मिट्टी का एक-चौथाई घन-जीवामृत मिलाएं और साथ कुछ राख (चुटकीभर) भी मिलाएं। अब इस घन-जीवामृत व राख मिश्रित मिट्टी के ऊपर बीजामृत का छिड़काव करके 48 घण्टे के लिए ढक कर रहनें दें।

2. चयनित 36 x 36 फुट के वर्गाकार भू-खण्ड के मध्य (⃞) में मध्यम ऊँचाई वाले पेड़ जैसे कि आँवला, ‌‌‌अमरूद, मौसम्बी, संतरा, किन्नू, मालटा, निम्बू इत्यादि लगाएं।

3. जहाँ तारांकित चिन्ह (⋆) है, वहाँ झाड़ीनुमा पौधे जैसे कि शरीफा (सीताफल), अनार, अरंडी इत्यादि में से कोर्ई भी लगाएं। ‌‌‌पौधे लगाने से पहले खड्डे से निकाली हुई संतृप्त मिट्टी (राख-घन-जीवामृत-बीजामृत) का इस्तेमाल अवश्य करें।

4. जहाँ त्रिकोन चिन्ह (▽) है वहाँ अरहर एवं बाजरा/मक्का के 2-2 बीज (बीजों को बीजामृत में संस्कारित) मिलाकर डालें।

8. जहाँ खड़े तीर के चिन्ह (­) का चिन्ह है, वहाँ केला, पपीता लगाएं। ‌‌‌पौधे लगाने से पहले खड्डे से निकाली हुई संतृप्त मिट्टी (राख-घन-जीवामृत-बीजामृत) का इस्तेमाल अवश्य करें।

9. जहाँ काला गोलकार बिन्दु (·) है, वहाँ सहजन/अरहर लगाएं। सहजन ‌‌‌के ‌‌‌पौधे लगाने से पहले खड्डे से निकाली हुई संतृप्त मिट्टी (राख-घन-जीवामृत-बीजामृत) का इस्तेमाल अवश्य करें।

5. जहाँ ‌‌‌खड़ी रेखा (ï) है, वहाँ मिर्च, शिमला मिर्च एवं गेंदा लगाएं।

7. जहाँ ‌‌‌गोलाई जैसे चिन्ह (F) है, वहाँ बरबटी/लोबिया, मूँग, उड़द, राजमा या अन्य बिन्स (Beans) लगाएं। चना भी लगा सकते हैं।

6. काले डॉट (×××××××) हैं, वहाँ हल्दी/अदरक लगाएं।

10. ‌‌‌नाली के दोनों किनारों के ऊपरी स्तर (§) पर तरबूज, ‌‌‌खरबूजा, गिलोय, खीरा, ककड़ी, कद्दू इत्यादि लगाएं। वर्षा ऋतु के पहले सभी नालियों को आच्छादन से भर दें।

जल प्रबन्धन: दो कतारों के बीच बनी हुई नाली में मई महीने में आच्छादन ‌‌‌डालने पर जैसे ही बारिश आती है, उस आच्छादन पर जीवामृत डाल दें।

बगीचे के पेड़ (छोटे): जो पेड़ 6 x 6 से 9 x 9 फुट के अन्तर पर लगे हैं उनको प्रति पेड़ 0.5:1.0 लीटर जीवामृत महीने में 1 या 2 बार बारिश काल में पेड़ को दोपहर को 12 बजे जो छाया पड़ती है उस छाया के सीमा पर दोनों या चारोंतरफ डाल दें।

‌‌‌बगीचे के पेड़ (मध्यम): आँवला, अमरूद, अनार, संतरा, मोसंबी, नीम्बू, किनू, मालटा आदि जो पेड़ 12 x 12 से 18 x 18 फुट के अन्तर पर लगे हैं उनको प्रति पेड़ 3-5 लीटर जीवामृत महीने में 1 या 2 बार बारिश काल में छाया की सीमा पर डालें।

‌‌‌बगीचे के पेड़ (बड़े): आम, चीकू, काजू, ईमली, जामुन, कटहल, लीची जैसे बड़े पेड़ - प्रति पेड़ 6-10 लीटर जीवामृत महीने में 1 या 2 बार बारिश काल में छाया की सीमा पर डालें।

वर्षा-ऋतु के बाद इन 3 प्रकार के बगीचों को प्रति एकड़ 200 लीटर जीवामृत सिंचाई के पानी के साथ महीने में 1 या 2 बार देना है।

‌‌‌नया पौधारोपण:

‌‌‌समय

‌‌‌जीवामृत - प्रति पौधा/प्रति माह छाया की सीमा पर डालें

‌‌‌जीवामृत - प्रति एकड़/प्रति माह सिंचाई के पानी के साथ

‌‌‌बीज लगाने/रोपाई के 1 महीने से 6 महीने तक

‌‌‌200 मि.ली.

-

‌‌‌6 महीने से 1 वर्ष तक

‌‌‌500 मि.ली.

‌‌‌200 लीटर

‌‌‌2 वर्ष से

‌‌‌1 लीटर

‌‌‌200 लीटर

‌‌‌3 वर्ष से (छोटे पेड़ को आगे हर वर्ष)

‌‌‌2 लीटर

‌‌‌300 लीटर

‌‌‌4 वर्ष से - मध्यम व बड़े पेड़

‌‌‌3 लीटर

‌‌‌300 लीटर

‌‌‌5 वर्ष से - मध्यम व बड़े पेड़

‌‌‌4 लीटर

‌‌‌300 लीटर

‌‌‌6 वर्ष से - (मध्यम पेड़ को आगे हर वर्ष)

‌‌‌5 लीटर

‌‌‌300 लीटर

‌‌‌7-12 वर्ष तक (बड़े पेड़ के लिए)

‌‌‌6-10 लीटर

‌‌‌300 लीटर

‌‌‌12 वर्ष के बाद (बड़े पेड़ के लिए)

‌‌‌10 लीटर

‌‌‌300 लीटर

‌‌‌‌3. जीवामृत का छिड़काव (नई फल बाग - पहला वर्ष):

‌‌‌अनुक्रम

‌‌‌छिड़काव का समय

‌‌‌मात्रा - प्रति एकड़

1.

‌‌‌बीज बुवाई या रोपाई के 1 माह बाद

‌‌‌100 लीटर पानी + 5 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

2.

पहले छिड़काव के 21 दिन बाद

‌‌‌150 लीटर पानी + 10 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

3.

दूसरे छिड़काव के 21 दिन बाद

‌‌‌200 लीटर पानी + 20 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

4.

तीसरे छिड़काव के 1 माह बाद

‌‌‌200 लीटर पानी + 5 लीटर खट्टी लस्सी/ छाछ जो 3 दिन पुरानी हो

5.

‌‌‌चौथे छिड़काव के 1 माह बाद

‌‌‌200 लीटर पानी + 20 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

‌‌‌दूसरा वर्ष

‌‌‌पहले 6 माह तक प्रति माह में

अगले 6 माह तक प्रति 2 माह में

‌‌‌200 लीटर पानी + 20 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

‌‌‌तीसरा वर्ष

‌‌‌प्रति 2 माह में एक बार

‌‌‌200 लीटर पानी + 20 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

 

पुरानी बाग:

फल तोड़ने के तुरन्त बाद कटे हुए हिस्से से जो रिसाव बाहर आता है उस पर फफूंद ‌‌‌बैठकर नुकसान करते हैं। इनसे बचाव के लिए तुड़ाई के तुरन्त बाद प्रति एकड़ 200 लिटर पानी + 20 लीटर जीवामृत का छिड़काव करें।

‌‌‌बहार आने के बाद कली अवस्था में तुरन्त प्रति एकड़ 200 लीटर पानी + 6 लीटर अग्नि-अस्त्र या दशपर्णी अर्क का छिड़काव करें। इस छिड़काव के 21 दिन बाद इसी का दोबारा प्रयोग करें।

‌‌‌जीवामृत का छिड़काव (पुरानी बाग)

‌‌‌अनुक्रम

छिड़काव का समय

मात्रा - प्रति एकड़

1.

‌‌‌फल का आकार 25% हो

‌‌‌200 लीटर पानी 20 लीटर कपड़े से छाना हुआ जीवामृत

2.

‌‌‌फल का आकार 50% हो

‌‌‌200 लीटर सप्त-धान्यांकुर अर्क

3.

‌‌‌फल का आकार 75% हो

‌‌‌200 लीटर सप्त-धान्यांकुर अर्क अथवा 200 लीटर पानी 5 लीटर खट्टी लस्सी/छाछ जो 3 दिन पुरानी हो

 

ß (विषय-सूचि पर जाएं)

गेहूँ की खेती; धान की खेती; सब्जियों की खेती; कपास ‌‌‌एवं ‌‌‌सब्जियों की खेती; गन्ने की खेती; आलू एवं सरसों की ‌‌‌खेती; अरहर, हल्दी ‌‌‌एवं मिर्च की खेती; पंचस्तरीय बागवानी; जीवामृत; घनजीवामृत; बीजामृत; सप्त-धान्यांकुर; नीमास्त्र; अग्नि-अस्त्र; ब्रह्मास्त्र; दशपर्णी अर्क; फफूंदनाशक (फंगीसाइड); आच्छादन; ‌‌‌जीवनद्रव्य, ह्यूमस; वाफसा और वृक्षाकार प्रबन्धन; सूक्ष्म पर्यावरण; पद्मश्री सुभाष पालेकर जी; अन्तिम पृष्ठ

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