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नवरात्र

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माँ जगदम्बा दुर्गा के नौ रूप मनुष्य को शान्ति, सुख, वैभव, निरोगी काया एवं भौतिक आर्थिक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं। माँ अपने बच्चों को हर प्रकार का सुख प्रदान कर आषिष की छाया में बैठाकर संसार के प्रत्येक दु:ख से दूर करके सुखी रखती है।

नवरात्रि काल में रात्रि का विशेष महत्त्व होता है। देवियों के शक्ति स्वरूप की उपासना का पर्व नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक, निश्चित नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ आदि काल से मनाया जा रहा है।

नवरात्र‘ शब्द में नव संख्यावाचक होने से नवरात्र के दिनों की संख्या 9 तक ही सीमित होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नही है। कुछ देवताओं के 7 दिनों के, तो कुछ देवताओं के 9 या 13 दिनों के नवरात्र हो सकते हैं। सामान्यतय: कुल देवता और इष्ट देवता का नवरात्र संपन्न करने का भी कुलाचार है।

किसी देवता का अवतार तब होता है, जब उसके लिए निमित्त होता है। यदि कोर्इ दैत्य उन्मत्त होता है, भक्तजन परम संकट में फंस जाते हैं अथवा इसी प्रकार की कोर्इ अन्य आपत्ति आती है तो संकट का काल 7 दिनों से लेकर 13 दिनों तक रहता है।

ऐसी काल अवधि में उस देवता की मूर्ति या प्रतिमा का टांक-चांदी के पत्र या नागवेली के पत्ते पर रखकर नवरात्र बैठाए जाते हैं। उस समय स्थापित देवता की षोड्शोपचार पूजा की जाती है।

अखण्ड दीप प्रज्वलन माला बंधन देवता के माहात्म्य का पठन, उपवास तथा जागरण आदि विविध कार्यक्रम करके अपनी शक्ति एवं कुलदेवता के अनुसार नवरात्र महोत्सव संपन्न किया जाता है।

यदि भक्त का उपवास हो तो भी देवता को हमेशा की तरह अन्न का नैवेद्य देना ही पड़ता है। इस काल अवधि में उत्कृष्ट आचार के एक अंग के स्वरूप बाल न काटना और कड़े ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।

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