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नवदुर्गा - स्त्री जीवन चक्र स्वरूप

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‌‌‌हम साल में दो बार नवरात्र त्योहार मनाते हैं व आदिशक्ति देवी के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं। यही अलौकिक आदिशक्ति हमारे हर घर में है। इस आदिशक्ति के विभिन्न रूपों को हम हर दिन दर्शन पाते हैं लेकिन समझते नहीं कि हमारे घर में आदिशक्ति है। यही शक्ति सुबह के समय माँ की दुलारती है व भोजन खिलाकर हमें दिनभर के लिए ऊर्जा प्रदान करती है। बहन की तरह हमारे संग खेलती है। यही शक्ति पत्नि के रूप में बार-बार प्रताड़ित होकर भी संयम के साथ जिंदगीभर साथ भी निभाती है। यदि हम देखें, समझें तो नवरात्र में देवी रूपी स्त्री की ही आराधना करते हैं जिससे हमें जिंदगी में उतार-चढ़ाव से लड़ने की शक्ति मिलती है। तो आईये जाने देवी नौ रूपों की महता किस प्रकार है। दुर्गा के नौ स्वरूप एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र को प्रतिबिम्बित करते हैं जो इस प्रकार हैं।

1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री" स्वरूप है ।

2. कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" का रूप है ।

3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह "चंद्रघंटा" समान है ।

4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह "कूष्मांडा" स्वरूप है।

5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कन्दमाता" हो जाती है।

6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" रूप है।

7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह "कालरात्रि" जैसी है।

8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से "महागौरी" हो जाती है।

9 धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार मे अपनी संतान को सिद्धि (समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली "सिद्धिदात्री" हो जाती है।

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