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भोजन के मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological Functions of Food)

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‌‌‌भोजनभोजन किसे कहते हैं?पोषण तत्त्वपोषण विज्ञानभोजन का वर्गीकरणभोजन का महत्त्व तथा कार्यभोजन के शारीरिक कार्य; भोजन के मनोवैज्ञानिक कार्य; भोजन के सामाजिक - सांस्कृतिक कार्य

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‌‌‌पोषण वैज्ञानिकों ने भोजन को भूख शांत करने के साथ-साथमन की भावनाओं को आभिव्यक्त करने के एक अच्छो साधन के रूप में माना है। यह हमारी मनोवैज्ञानिक ‌‌‌आवश्यकताओं को निम्न प्रकार से पूरा करता है -

(i) कर्इ बार ‌‌‌पोषक तत्त्वों से युक्त भोजन भी उतनी तृप्ती प्रदान नहीं कर पाता जितनी कि प्यार से परोसा सरल, साधारण आहार। इससे खाने वाले की भूख तो बढ़ती ही है साथ में उसका भोजन परोसने वाले के प्रति प्रमे भी बढ़ जाता है।

(ii) भोजन एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति की मानसिक दशा का पता चलता हैं। चिन्ता, डर दु:ख तथा क्रोध के समय भूख कम लगती है तथा स्वादिष्ट भोजन भी कम रूचिकर लगता हैं। इसके विपरीत खुशी की अवस्था में खाना खाने का मज़ा अधिक आता है। बच्चों को जब अपनी मनपसन्द कोर्इ वस्तु नहीं मिलती तो वे खाना न खाकर अपना गुस्सा प्रकट करते हैं। माता-पिता भी बच्चों को मानने के लिए उनका मन पसन्द खाना बनाने का लालच देते हैं। ‌‌‌नाराजगी प्रकट करने के लिए हम खाना खाने से इन्कार करके अपने भावों को प्रकट करते हैं।

(iii) भोजन के द्वारा हम अपनी भावनाओं की दूसरों के प्रति अभिव्यक्ति प्रकट कर ‌‌‌पकाते हैं जिस व्यक्ति से हमें लगाव होता है असके लिए हम बड़ी मेहनत से, उसका मनपसन्द खाना बनाते हैं। इसमें हमें खुशी मिलती है और खाने वाले का हमारे प्रति लगाव बढ़ता है। इाके विपरीत जो व्यक्ति हमें अच्छा नहीं लगता असके लिए खाना बनाने में खुशी वाली भावना कम होती है।

(iv) बच्चे भी भोजन के मनोवैज्ञानिक महत्तव को महसूस करते हैं छोटा बच्चा माँ की गोद में खुश होकर दूध पीता है। क्योंकि माँ बच्चे को दूध पिलाते समय, प्यार से ‌‌‌उसके सिर पर हाथ फेरती है जिससे बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा महसूस होती है और वह अपने ‌‌‌कष्टों को भी भूल जाता है।

(v) जब कोर्इ ग्रहणी स्वादिष्ट पकवान परोसती है और सब उसकी तारिफ़ करते हैं तो इससे ग्रहणी को प्रसन्नता और ‌‌‌संतुष्टि महसूस होती है।

(vi) अतिथि कको सम्मान देने के लिए हम उसके भोजन को पकाने तथा परोसने की तरफ़ ‌‌‌विशेष ध्यान देते हैं।

(vii) भोजन के लिए निमन्त्रण देने से ‌‌‌विशेष लगाव की अनुभूति होती है।

(viii) भोजन खाने से जो तृप्ती तथा ‌‌‌सन्तुष्टि मिलती है वह पौष्टिक तत्त्वों की गोलियों से नहीं मिलती।

(ix) घर में खाना खाते हुए, सभी सदस्य इकट्ठे बैठकर, कुछ समय तनावमुक्त वातावरण में हंसी-मज़ाक करते हैं। इससे उनका मनोरंजन भी हो जाता है तथा एक दूसरे के साथ लगाव भी बढ़ता है। किसी सदस्य को कोर्इ समस्या हो तो उसके बारे में बात करके वह अपना तनाव कम कर सकता है। कभी-कभी अच्छा समाधान भी मिल जाता है।

(x) भोजन से मानसिक तनाव कम हो जाता है। यही कारण है कि कर्इ बार मानसिक रूप से परेशान तथा अकेलापन महसूस करने वाला ‌‌‌व्यक्ति अधिक भोजन खाकर ‌‌‌सन्तुष्टि अनुभव करता है। कर्इ बार इसके विपरीत भी होता है। अधिक चिन्ता के कारण खाना खाने की इच्छा कम हो जाती है।

(xi) जब घर में कोर्इ खुशी वाली बात होती है। तो मिठार्इ खार्इ तथा खिलार्इ जाती है।

(xii) जब किसी समस्या के हल के लिए किसी वार्ता का आयोजन किया जाता है तो जलपान आयोजन को ‌‌‌विशेष महत्तव दिया जाता है।

(xiii) जब हमें ऐसा भोजन खाने को मिलता है जिससे हम आदि नहीं होते तो वह भोजन स्वादिष्ट पौष्टिक होने पर भी हमें ‌‌‌संतुष्टि तथा तृप्ति नहीं देता। इसके विपरीत हमारा मनपसन्द भोजन पौष्टिक न होने पर भी ‌‌‌संतुष्टि तथा तृप्ति की भावना पैदा करता है।

(xiv) जब बच्चे स्कूल में या बड़े लोग कार्य स्थल पर मिल कर खाना खाते है तो उसमें एक नया स्वाद आ जाता है। दूसरों को खाना खिलाना तथा दुसरों को खाना खिलाना तथा अच्छा लगता है। नए स्वाद विकसित होते हैं तथा नए भोज्य पदार्थों के बारे में पता चलता है। बच्चे उन ‌‌‌खाद्य ‌‌‌पदार्थों को भी चाव से खाने लगते हैं जिन्हें वे पहले नहीं खाते थे।

‌‌‌सरोज बाला, ‌‌‌कुरूक्षेत्र (‌‌‌हरियाणा)

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