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‌‌‌आयोडीन की कमी से होने वाली हानियाँ, Effects of Iodine deficiency - Hypothyroidism

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आयोडीन, Iodine, ट्रेस तत्व, Trace Elementआयोडीन के कार्य (Functions of Iodine)आयोडीन की कमी से होने वाली हानियाँ (Effects of Iodine deficiency - Hypothyroidism)आयोडीन की अधिकता से हानियाँ (Effects of excessive intake of iodine -Hyperthyroidism)आयोडीन की प्राप्ति के साधन (Sources of lodine)आयोडीन की प्रतिदिन की आवश्यकता (Daily Requirement of Iodine)

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1. घेंघा (Goiter) - शरीर में आयोडीन की कमी होने पर भी, थायरोक्सिन की आवश्यक मात्रा तो निर्मित होती रहती है किन्तु थायरोक्सिन निर्माण के लिए चुल्लिका ग्रन्थि (Thyriod gland) को अधिक कार्य करना पड़ता है। इससे ग्रन्थि का आकार बढ़ जाता है (200 से 500 ग्राम या इससे भी अधिक)। इसे घेंघा (Goiter) रोग कहते हैं। इस रोग में प्राय: दर्द नहीं होता किन्तु ग्रन्थि का आकार बढ़ने से यह गले में सूजन के रूप में दिखार्इ देती है। इससे गले में फालतू बोझ सा लगता है तथा सौन्दर्य भी प्रभावित होता है। अगर इस ग्रन्थि का आकार असामान्य रूप से बढ़ जाता है ‌‌‌श्वास नली पर दबाब डलने से सांस लेने में कठिनार्इ उत्पन्न हो सकती है। आयोडीन की उपयुक्त मात्रा लेने से ग्रन्थि का आकार और बड़ा नहीं होता किन्तु बढ़ा हुआ आकार कम भी नहीं ऐसी स्थिति में केवल शल्य चिकित्सा से ही उपचार संभव है। पुरूषों की अपेक्षा किशोर लड़कियों तथा महिलाओं में यह रोग अधिक होता है। घेंघा रोग का प्रकोप मुख्यता समुद्र तट से दूर, ऊंचार्इ वाले पथरीले पहाड़ी प्रदेशों में अधिक होता है। आयोडीन युक्त नमक का प्रयोग करने से इस रोग से बचा जा सकता है। अनुसंधानों से यह पता चला है कि शलगम, मूली, पालक, फूल-गोभी तथा बन्द-गोभी में कच्ची अवस्था में थायो-ऑक्साजोलिडान (Thio-oxazolidon) नामक एक पदार्थ पाया जाता है जो आहार में उपस्थित आयोडीन से क्रिया करके उसके अवशोषण में बाधा डालता है तथा टायरोसिन अमीनो अम्ल को पचने नहीं देता। दससे थाइरोक्सिन कम मात्रा में बनता है। इन ‌‌‌खाद्य पदार्थों का इत्यधिक मात्रा में कच्चे रूप में सेवन करने से भी घेंघा रोग हो जाता है। पकाए जाने पर इन ‌‌‌खाद्य पदार्थों में ‌‌‌उपस्थित थायो-‌‌‌ऑक्साजोलिडान‌‌‌ नष्ट हो जाता है।

2. बौनापन (Cretinism) - बौनापन अधिकतर उन बच्चों में पाया जाता है जिनकी माता ने किशोरावस्था या गर्भावस्था में आयोडीन का प्रयोग कम मात्रा में किया हो। इसकी कमी से बच्चों का शारीरिक तथा मानसिक विकास रूक जाता है। त्वचा मोटी, सूखी तथा खुरदरी हो जाती है। चयापचय की दर सामान्य से कम हो जाने से मांसपेशियां कमजोर तथा कोमल हो जाती हैं। त्वचा में झुर्रियां (Wrinklens) पड़ जाती हैं जीभ बड़ी हो जाती है। होंठ इतने मोटे हो जाते हैं कि उन्हें बन्द करना कठिन हो जाता है। बड़े होने पर बच्चे के जनन अंगों की वृद्धि रूक जाती है तथा लम्बार्इ केवल 7-8 ‌‌‌वर्ष के बच्चे के समान होती है। बाल रूखे, कड़े तथा पतले हो जाते हैं। बच्चे के चेहरे का भाव बदल जाता है। जन्म के तुरन्त बाद इस रोग का इलाज किया जाता ‌‌है तो ठीक होने की संभावना होती है, किन्तु 8-9 वर्ष तक इलाज न किया जाए तो शारीरिक तथा मानसिक लक्षण स्थायी हो जाते हैं।

3. मिक्सोडिमा (Myxocedema) - बड़ों में आयोडीन की कमी को मिक्सोडिमा कहते हैं जिन व्यस्कों में आयोडीन की कमी उनके वृद्धिकाल में रही होती है, यह रोग प्राय: उन्हीं में पाया जाता है। इस रोग में चेहरा भाव-हीन हो जाता है, रोगी आलसी, सुस्त तथा निर्दालु हो जाता है। सर्दी के प्रति संवदेनशीलता बढ़ जाती है। हाथ, पांव तथा चेहरे पर सूजन आ जाती है।

सरोज बाला, ‌‌‌कुरूक्षेत्र (‌‌‌हरियाणा)

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