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लोहे की कमी के प्रभाव, Effect of Iron Deficiency

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लोहा, Iron, ट्रेस तत्व, Trace Element; लोहे के कार्य (Functions of Iron); लोहे की कमी के प्रभाव (Effect of Iron Deficiency); ‌‌‌लोहे की अधिकता के प्रभाव (Effects of excessive intake of Iron); लोहे की प्राप्ति के साधन (Sources of Iron); लोहे की दैनिक आवश्यकता (Daily Requirement of Iron)

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लोहे की कमी के निम्नलिखित प्रभाव हैं -

1. अरक्तता (Anaemia) - अरक्तता की स्थिति में लोहे की कमी से रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम हो जाता है (लगभग 5-6 ग्राम प्रति 100 रक्त)। हीमोग्लोबिन का सामान्य स्तर विभिन्न अवस्थाओं में इस प्रकार से है - पुरूशों में 15 - 17 ग्राम/100 मि0 ली0 रक्त, सामान्य स्त्री में 13-15 ग्राम/100 मि0 ली0 रक्त गर्भवती स्त्री में 11 ग्राम/100 मि0 ली0 रक्त तथा बच्चों में 11-12 ग्राम/100 मि0 ली0 रक्त होता है।

2. भोजन में लोहे की पर्याप्त मात्रा न लेना जिससे हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है।

3. लाल रक्त कणिकाओं का मात्रा में कम होना या अपरिपक्व होना।

‌‌‌4. आंतरिक अथवा बाहरी रक्त स्त्राव के ‌‌‌द्वाराकी कमी होना।

5. ‌‌‌आहार में फोलिक अम्ल, कोबाल्ट या ‘सी’ की कमी होना। इससे लोहे का ‌‌‌अवशोषण पूर्ण रूप से नहीं होता।

6. शरीर में लोहे की आवश्यकता बढ़ जाना (जैसे गर्भावस्था) किन्तु लौह तत्व की मात्रा न बढ़ना।

7. ‌‌‌बवासीर की स्थिति में या पेट में कीडे़ होने की स्थिति में भी रक्तहीनता हो जाती है।

8. ‌‌‌मलेरीया तथा टायफायड ज्वर में भी लाल रक्त कण ‌‌‌अधिक मात्रा में ‌‌‌नष्ट हो जाते हैं।

सामान्य अरक्तता तीन प्रकार की होती है -

1. माइक्रोसिटिक तथा हाइपोक्रोमिक (Microcytic and Hypochromic) - इस प्रकार अरक्तता में, शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए लौह तत्व की कमी होने से, लाल रक्त कणिकाओं (Red Blood corpuscles or R. B. C.) का रंग हल्का लाल तथा आकार भी सामान्य से छोटा (microcytic) हो जाता है। हीमोग्लोबिन का स्तर भी सामान्य से कम (Hypochromic) हो जाता है। आहार में पिरिडॉक्सिन की कमी से भी अरक्तता हो जाती है तथा तब् इसका उपचार लौह तत्व की अपेक्षा आहार में पिरीडॉक्सिन (Pyridoxine) की मात्रा बढ़ाने से ही होता है।

2. मैकरोसिटिक मैगेलोब्लास्टिक अरक्तता (Microcytic Megaloblastic Anaemia) - इस प्रकार की रक्त हीनता में लाल रक्त कणो का आकार अनियमित तथा सामान्य से बड़ा हो जाता है। हीमोग्लोबिन का स्तर तो सामान्य होता है परन्तु फोलिक अम्ल की कमी से रक्त कोशिकाएं पूर्णतया परिपक्व नहीं हो पाती तथा संख्या में भी कम हो जाती हैं।

विटामिन सी की कमी से या आयोडीन की कमी से भी लाल कणों की संख्या कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में भी कम हो जाती है।

3. दवाइयों या धातुओं के ‌‌‌विषैले प्रभाव से होने वाली अरक्तता (Anaemia due to toxic agents or chronic poisoning with metals) - सल्फा तथा एन्टीबायोटिक दवाइयों के निरन्तर उपयोग से तथा मलेरिया, टायफाइड या कालाज़ार रोगों में कणिकाओं का संशलेशण कम मात्रा में होता है। कुछ धातुओं जैसे सीसा (Lead) तथा ‌‌‌आर्सेनिक (Arsenic) आदि के ‌‌‌विषैले प्रभावों से रक्त कणिकाएं ‌‌‌नष्ट होने लगती हैं तथा उनकी जीवन अवधि भी कम हो जाती है।

अरक्तता के लक्षण (Symptonms of Anaemia): अरक्तता के लक्षण दो प्रकार के होते हैं: गुप्त लक्षण (Latent Symptoms) और 2. व्यक्त लक्षण (Clinical Symptoms)

गुप्त लक्षण (Latent Symptoms): - कभी-कभी अरक्तता के लक्षण बाहर से दिखार्इ नहीं देते किन्तु इससे लोहे के भण्डार समाप्त होने लगते हैं। ‌‌‌प्लाज्मा में लोहे की मात्रा कम होने से रक्त का लाल रंग हल्का पड़ जाता है तथा रक्त के गाढ़ेपन में कमी आ जाती है। रक्त के ‌‌‌प्लाज्मा में लोहे की मात्रा कम हो जाती है। दिल की धड़कन बढ़ने से कभी-कभी सीने में दर्द भी होता है।

व्यक्त लक्षण (Clinical Symptoms):

1. बाहरी ‌‌‌लक्षणों में, ऑक्सीजन की कमी से ऊर्जा उत्पत्ति में कमी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप थकावट तथा कमजोरी महसूस होती है।

2. ‌‌‌आँखें, नाखून तथा जीभ पीली पड़ जाती है, ‌‌‌दृष्टि मलिन हो जाती है तथा ‌‌‌आँखों के नीचे काले गड्ढे दिखार्इ देने लगते हैं।

3. रोगी को सिर-दर्द होता है, चक्कर आते हैं तथा सांस लेने में कठिनार्इ होती है। पैरों में सूजन आ जाती है।

4. भूख कम लगती है और पेट में जलन होती है। लगभग 3 ‌‌‌वर्ष की आयु के बच्चे ‌‌‌मिट्टी खाने लग जाते हैं।

5. नाखून सपाट, भुरभुरे तथा चम्मच के आकार के हो जाते हैं।

6. बाल चमकहीन तथा नीचे से दो मुंह वाले हो जाते हैं।

अरक्तता के कारण (Causes of Anaemia): अरक्तता के निम्नलिखित कारण हैं -

1. भोजन में लोहे की कमी़ (Deficiency of iron in food): - लोहे की कमी प्राय: बच्चों, किशोर लड़कियों तथा गर्भवती माताओं को विशेश रूप से होती है। बच्चों को लम्बे समय तक केवल दूध पर ही निर्भर रखने से उनकी लोहे की आवश्यकता पूरी नहीं होती। इस अवस्था में उनकी शारिरिक वृद्धि होने के साथ - साथ रक्त की मात्रा में भी वृद्धि ोिती रहती है। भोजन में लोहे की पर्याप्त मात्रा न होने से हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम हो जाता है। इससे बच्चों की भूख कम हो जाती है तथा बच्चे उदासीन हो जाते हैं। त्वचा का रंग पीला पड़ जाता है।

2. मासिक धर्म (Menstruation cycle): - लड़कियों में मासिक धर्म के कारण प्रत्येक मास होने वाले रक्त स्त्राव से लोहे की हानि होती है। यह स्थिति 40 - 50 ‌‌‌वर्ष की अवस्था तक रहती है। इस हानि को पूरा करने के लिए लोहे की अधिक मात्रा में आवश्यकता हाती है। प्रजनन क्षमता समाप्त (Menopause) होने पर स्त्रियों तथा ‌‌‌पुरूषों की लोहे की आवश्यकता समान हो जाती है।

3. गर्भवस्था (Pregnancy): - गर्भावस्था में, तीव्र गति से विकसित हो रहे भ्रूण के रक्त निर्माण के लिए अधिक लोहे की आवश्यकता होती है। नवजात शिशु अपने शरीर में लोहे का कुछ संचय लेकर पैदा होते हैं। इसलिए भी ‌‌‌गर्भवती स्त्रियों के आहार में लोहे की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। इस अवस्था में लोहे की हीनता होने से सांस लेने में परेशानी, चक्कर आना तथा रक्त ‌‌‌स्राव भी हो सकता है। बार-बार गर्भ धारण करने से स्त्रियों में रक्तहीनता हो जाती है।

एनीमिया का उपचार (Treatment of Anaemia)

एनीमिया का उपचार उसके कारणों पर निर्भर करता है। आहार में कमी के कारण होने वाली अरक्तता का उपचार भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, ‌‌‌माँस, ‌‌‌मछली, अण्डा तथा विटामिन ‘सी’ युक्त पदार्थ जैसे ‌‌‌संतरा, नीम्बू, ‌‌‌आँवला, अमरूद आदि का समावेश करके किया जा सकता है। पेट में कीड़ों के कारण होने वाली अरक्तता के उपचार के लिए ‌‌‌कृमिनाशक दवार्इ लेनी चाहिए। अरक्तता अधिक अधिक मात्रा में होने से डाक्टर के परामर्श अनुसार लौहयुक्त दवार्इ तब तक लेनी चाहिए जब तक ‌‌‌हीमाग्लोबिन का स्तर सामान्य तक न पहुंच जाए। विटामिन सी, फोलिक अम्ल, प्रोटिन तथा कोबाल्ट लोहे के ‌‌‌शोषण में सहायता करते हैं तथा फाइटेट्स (Phytates) लोहे के अव‌‌‌शोषण में ‌‌‌बाधा पहुंचाते हैं।

‌‌‌सरोज बाला, ‌‌‌कुरूक्षेत्र (‌‌‌हरियाणा)

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