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मल्लसिन्दूर

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गुण व उपयोग: मल्लसिन्दूर वात व कफ के विकारों में उत्तम लाभ करता है। पक्षाघात, आमवात, धनुष्टंकार आदि वात रोगों में कफ संबंधी कास, स्त्रियों के हिस्टीरिया, बुढ़ापे की दुर्बलता, श्वास, न्यूमोनिया, उर:स्तोय, डब्बा, मूत्राशय तथा शुक्रप्रणालियों की कमजोरी, मलेरिया, हैजा, सिफलिस आदि रोगों में अनुपान भेद से यह आशातीत लाभ करता है। यह रक्तवाहिनियों में उत्तेजना पैदा करता है और हृदय की गति को बढ़ाता है। हस्तमैथुन से नपुंसक हुए पुरूषों को इसके सेवन से उत्तम लाभ मिलता है। मलेरिया में शहद और तुलसी के पत्तों के रस के साथ दें। पक्षाघात आदि विकारों में मल्लसिन्दूर 62.5 मिलीग्राम को शहद के साथ दें व ऊपर से महारास्नादि क्वाथ 50 ग्राम में शहद मिलाकर पिला दें। न्यूमोनिया, इन्फ्लूएंजा आदि रोगों में श्रृंग भस्म या गोदन्ती भस्म में मिलाकर पान के रस और शहद के साथ दें।

मात्रा व अनुपान: 62.5 से 125 मिलीग्राम, दिन में दो बार शहद व अदरक के रस के साथ या रोगानुसार अनुपान से दें।

विशेष: तेज बुखार में इसे नही देना चाहिए। इसको प्रवालपिष्टी जेसी सौम्य औषधी के साथ मिलाकर देने से ज्यादा गर्मी महसूस नही होती है।

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