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सुवर्ण समीर पन्नग रस

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गुण व उपयोग: सुवर्ण समीर पन्नग रस कठिन वात विकारों व पक्षाघात की उत्तम औषधी है। यह सब प्रकार के वात रोगों में जैसे कटिस्तम्भ, पाश्र्वशूल, अर्दित, पक्षाघात, कफाधिक्य, तमक श्वास व सन्निपदत ज्वर में अच्छा लाभ प्रदान करता है। चिन्ता, भय शोक और क्रोध से उत्पन्न होने वाले हिस्टीरिया, उन्माद, वातजन्य निर्बलता आदि में इसका उपयोग करने से अच्छा लाभ मिलता है। सिर में रक्त संचरण निर्बलता आदि में इसका उपयोग किया जाता है। अस्थिशोष, जंघादि वेदना एवं पुरातन फिरंगजन्य अण्डमांस की वृद्धि, चित्त का सदा खिन्न रहना, भ्रम, ग्लानि इस सब रोगों में यह बहुत लाभ करता है। इसके प्रयोग से पुराना कासरोग शान्त हो जाता है। तीव्र पांडु रोग में जब रक्ताणुओं की कमी हो, श्वेताणुओं की वृद्धि होकर शरीर में पांडु रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं, इसके प्रयोग से रक्ताणुओं की वृद्धि होने लगती है, इसी प्रकार हृदय की दुर्बलता दूर कर हृदय में ताकत पहुंचाता है। कारण, इसमें स्वर्ण का संयोग रहता है। अत: हृदय को उत्तेजित कर हृदय की दुर्बल गति को सबल बना देता है। हरताल, संखिया-भस्म का प्रभाव श्वासन-संस्थान पर बल्य रूप में होता है।

मात्रा व अनुपान: 62.5 से 125 मिलीग्राम, शहद या अदरक रस के साथ।

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