Home | आयुर्वेद संग्रह | ‌‌‌कुपीपक्व रसायन | स्वर्णबंग (सुवर्णराजवंगेश्वर)

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स्वर्णबंग (सुवर्णराजवंगेश्वर)

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गुण व उपयोग: स्वर्णबंग का विशेष प्रभाव शुक्रस्थान, मूत्रपिण्ड व वीर्य वाहिनीयों पर होता है।अत: यह प्रमेह, नामर्दी, शीघ्रपतन, शुक्रस्राव आदि मूत्र व वीर्य-विकारों को जल्दी ठीक करता है। लगातार कुछ दिनों तक इसका सेवन करने से शुक्र की कमी दूर दो कामवासना जागृत होती है। इसके सेवन से स्वप्नदोष बहुत जल्दी नष्ट हो जाता हैं स्वर्ण बंग शीतवीर्य, शीतगुण, रू़क्ष, तिक्त, किञ्चित लवण तथा अम्लयुक्त होता है। यह सम्पूर्ण शरीर को बल देने वाला रसायन है। यह प्रमेहनाशक, बुद्धिवर्द्धक, बल्य और नेत्रों के लिए अतिलाभदायक है। इसके लगातार कुछ दिनों तक सेवन करने से शारीरिक  कान्ति बढ़ जाती है और भूख लगने लगती है। इसके सेवन से शरीर में शुक्रधातु की उत्पत्ति होती है। जीर्ण,  सूजाक और श्वेत प्रदर में इससे अच्छा लाभ होती है। सूजाक से उत्पन्न हुर्इ नपुंसकता तथा स्त्री-पुरूष की जननेन्द्रियों के सभी विकार इस रसायन से दूर हो जाते हैं। स्त्रियों के सोम रोग, अस्थिस्राव व श्वेतप्रदर जन्य क्षय में इसका लाभकारी प्रभाव होता है। पुराना कास तथा श्वास भी इससे नष्ट हो जाता है। इसके सेवन से रक्तादि दुर्बलता दूर होती है। शुक्राणुओं की कमी व इससे जुड़े अन्य दोष स्वर्ण बंग 125 मिलीग्राम, रस-सिन्दूर 125 मिलीग्राम, दोनों को एकत्र पीसकर शहद में मिलाकर सुबह-शाम चाटने से आशातित लाभ मिलता है। इसका सेवन पथ्यपूर्वक एकमात्र करना चाहिए। वृक्कत की दुर्बलता के कारण बहुमूत्र या प्रमेह रोग में इसका सेवन अत्यन्त लाभकारी है।

मात्रा व अनुपान: 125 से 250 मिलीग्राम, शहद, मक्खन, मलार्इ आदि के साथ अथवा रोगानुसार अनुपान के साथ।

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