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बथुआ विदेशी, Mexican tea, Chenopodium ambrosioides

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व्यवहारिक नाम:

अंग्रेजी: मेक्किन टी (Mexican tea)‌‌‌, wormseed, Jesuit's tea।

गुजराती: चंदनबेटो‌‌‌।

बंगला: चंदनबेटो‌‌‌।

मराठी: वन्दनबटया‌‌‌।

लैटिन: चेनीपोडियम एम्ब्रोसओड्स‌‌‌ (Chenopodium ambrosioides) ‌‌‌डिस्फानीया एम्ब्रोसओड्स‌‌‌ (Dysphania ambrosioides)।

संस्कृत: सुगंधवास्तूक चंडिल‌‌‌।

हिन्दी: बथुवा विदेशी, चिल्ली‌‌‌।

‌‌‌‌‌‌पौधे का स्वरूप: बथुआ एक वनस्पति है जो खरीफ के फसलों के साथ उगता है। इसका शाक बनाकर खाने के काम आता है। बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है। एक डेढ़ फुट का यह हराभरा पौधा कितने ही गुणों से भरपूर है।

‌‌‌औषधीय गुण: बथुवा विदेशी क्षारयुक्त, मधुर, बलवर्द्धक तथा त्रिदोष (वातपित्तकफ) नाशक होता है। इसके पत्ते और कोमल डंठलों का साग भी बनाया जाता है। प्राचीनकाल में आदिवासी लोग घरेलू इलाज की तरह इसके पत्तों और बीजों के काढ़ा का उपयोग पेट के कीड़ों को नष्ट करने के लिए करते थे।

आयुर्वेदिक विद्वानों ने बथुआ को भूख बढ़ाने वाला पित्तशामक मलमूत्र को साफ और शुद्ध करने वाला माना है।

‌‌‌उदर रोग: बथुए का रस और इसका उबाला हुआ पानी पीने से पेट की हर बीमारी ठीक हो सकती है। इससे यकृत, तिल्ली, अजीर्ण, गैस, कृमि, पेट में दर्द, बवासीर जैसी समस्याओं में भी लाभ होता है।

‌‌‌उदरकृमि: पेट में कीड़े हो जाने पर कच्चे बथुए का रस एक कप में स्वादानुसार मिलाकर एक बार प्रतिदिन पीते रहने से कृमि मर जाते हैं। बथुए के बीज एक चम्मच पिसे हुए शहद में मिलाकर चाटने से भी कृमि मर जाते हैं तथा रक्तपित्त ठीक हो जाता है।

कब्ज: कब्ज की शि‍कायत है तो बथुआ खाने से यह दूर हो सकता है। कुछ सप्ताह तक रोजाना बथुए की सब्जी खाने से कब्ज पूरी तरह से दूर हो जाता है। साथ ही शरीर में ताकत आती है और स्फूर्ति बनी रहती है।

गुर्दे की पथरी: बथुआ के सब्जी प्रतिदिन खाने से गुर्दे की पथरी में लाभ होता है। इस सब्जी का प्रयोग कर आप अपने अमाशय को मजबूत कर सेहतमंद बनाए रख सकते हैं।

गुर्दे के रोग: गुर्दे की अन्य बीमारियों के अलावा पेशाब के रोगों में बथुए का साग लाभदायक है। पेशाब न आने की स्थि‍ति में भी बथुए का साग खाना बहुत फायदेमंद होता है। इसके अलावा आधा किलो बथुआ, तीन गिलास पानी में उबालकर इसे छानकर नींबू, जीरा, काली मिर्च और सेंधा नमक ज्ञलकर पीने से भी लाभ होता है।

‌‌‌चर्म रोग: सफेद दाग, दाद, खुजली, फोड़े, कुष्ट आदि चर्म रोगों में नित्य बथुआ उबालकर, इसका रस पीने और तथा सब्जी खाने से फायदा होता । बथुए के उबले हुए पानी से त्वचा को धोने और बथुए के पत्ते का निचोड़कर रस तिल का तेल के साथ गर्म कर त्वचा पर लगाने से आराम होता है। 

फोड़े, फुन्सी, सूजन: फोड़े, फुन्सी, सूजन होने पर, बथुए को कूटकर सौंठ और नमक मिलाएं और गीले कपड़े में बांधकर कपड़े पर गीली मिट्टी लगाकर आग में सेकें। सिकने पर गर्म-गर्म बांधें। फोड़ा बैठ जाएगा या पककर शीघ्र फूट जाएगा।

मासिक धर्म की समस्या: महिलाओं में मासिक धर्म की समस्या होने पर या मासिक धर्म न आने पर दो चम्मच बथुए के बीज एक गिलास पानी में उबालें। आधा रहने पर इसे छानकर पी पिएं। इससे मासिक धर्म खुलकर आता है।

‌‌‌मुँह की बीमारियां: मुंह का अल्सर, सांसों में दुर्गंध आना, दांतों से संबंधि‍त रोग आदि समस्याएं होने पर बथुए की पत्त‍ियों को चबाना फायदेमंद हो सकता है। इससे पायरिया में भी लाभ होता है।

रक्तशोधक: खून साफ करने के लिए बथुआ खाना फायदेमंद होता है। यह एक अच्छा रक्तशोधक है। इसके अलावा यह पाचन तंत्र को बेहतर तरीके से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।

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