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प्रमेहगजकेशरी रस

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गुण व उपयोग: प्रमेहगजकेशरी रस प्रमेह में लाभदायक है। इसमें लौह भस्म, नाग व बंग भस्म एवं शुद्ध शिलरजित घटक द्रव्य होने के कारण यह रस शुक्रस्राव को कुछ दिन में रोग देता है। इसके अलावा यह प्रमेह, मधुमेह, मूत्रकृच्छ, अश्मरी और दाह आदि को नष्ट करता है। इसके सेवन से मधुमेह में होने वाले अधिक पेशाब, प्यास, मुँह सूखना, भूख अधिक न लगना, आँखों के आगे अंधेरा छा जाना, भ्रम होना, कानों में आवाज होना, बेचैनी, सिर-दर्द आदि लक्षण होने पर यह रस बहुत लाभ प्रदान करता है। मधुमेह में शर्करा की मात्रा कम करता है। इसके सेवन द्वारा अग्न्याशय की ​‌‌‌विकृतिजन्य पाचनक्रिया की न्यूवता से शारीरिक धातु-उपधातुओं की विकति दूर हो जाती है और अग्न्याशय सबल होने पर शर्करा की अधिक उत्पत्ति नही होती है। पुराने मूत्रकृच्छ रोग में इसका उपयोग किया जाता है। इसमें मूत्र का वेग तो मालूम पड़ता है, लेकिन मूत्राशय से लेकर मूत्रनी के बीच किसी चीज की रूकावट हो जाने से पेशाब खुलकर न होकर कठिनता से थोड़ी-थेड़ी मात्रा में होता है। कठिनता से पेशाब होने के कारण ही इय रोग का नाम ‘मूत्रकृच्छ’ पड़ा है। पुराने सूजाक वाले रोगियाके को अक्सर यह रोग हो जाया करता है। मधुमेह में वात प्रकोप के कारण सर्वांग में दर्द, रक्तवाहिनी नाड़ियों में वात-प्रकोप होना, कलाय खंज (लगड़ापन), चलने में पाँव काँपना, शरीर में सन्धियों की शिथिलता तथा उनमें अधिक दर्द होना, इस लक्षणों में इस औषधी के उपयोग से बहुत लाभ होता है।

मात्रा व अनुपान: 1 से 2 गोली, दिन में दो बार पानी या गुड़मार बूटी के क्वाथ के साथ।

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